हमने 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1974 का छात्र आंदोलन नहीं देखा है। परंतु, आज 16 अगस्त 2011 को गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन से उन दोनों आंदोलनों का अनुमान लगाया जा सकता है। शासक और जनता दोनों के चेहरे नजर आ गये। शासक अपनी सत्ता के घमंड में उन्मत रहा और जनता अपनी मुक्ति का रास्ता देख कर जी जान से आंदोलन को सफल बनाने में जुट गयी। कहा जाने लगा कि देश में 1975 की तरह फिर आपातकाल लगाया जा रहा है।
इस आंदोलन की शुरुआत इस वर्ष मई में ही हो चुकी थी, जब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा कानून लोकपाल बनाने की मांग को लेकर अन्ना हजारे अपनी टीम के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गये थे। उस समय भी देश भर से अन्ना को समर्थन मिला था। खासकर दिल्ली के युवाओं ने अन्ना के आंदोलन को इतना बड़ा कर दिया था कि सरकार उस समय ही घबरा ही गयी थी। अचानक आयी इस मुसीबत को टालने के लिए सरकार ने आंदोलन के तीसरे दिन ही अन्ना की सारी मांगे मानने की घोषणा कर अन्ना का अनशन खत्म करवाया था। इसके बार सरकार की ओर से चार और अन्ना की ओर से चार लोगों को लेकर एक संयुक्त समिति बनायी गयी, जिसे लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करना था। आंदोलन शांत होने के बाद सरकार अपना खेल खेलने लगी। समिति की बैठक तो होती थी, लेकिन मसौदा में वही बातें शामिल होतीं, जिसे सरकार के लोग चाहते थे। इससे अन्ना की टीम ने पहले तो दबे स्वर में विरोध किया, लेकिन जल्दी ही दोनों पक्षों के बीच तल्खियां बढ़ने लगीं। अन्ना की टीम ने मांग की कि बैठक को लाइव टेलीकास्ट किया जाए। सरकार इसपर तैयार नहीं हुई। आखिरकार अन्ना की टीम ने बैठक में भाग लेने से इन्कार कर दिया।
अन्ना की टीम में मुख्य सहयोगी हैं- अरविंद केजरीवाल, जो कि मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित आरटीआई के कार्यकर्ता हैं। दूसरी सदस्य हैं भारत की प्रथम महिला आइपीएस और जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता किरण बेदी। तीसरे सदस्य हैं स्वामी अग्निवेश जो कि अखिल भारतीय आर्य समाज के प्रमुख हैं और हमेशा ही सामाजिक मुद्दे पर सक्रिय रहे हैं। चैथे सदस्य हैं प्रशांत भूषण जो कि संविधान विशेषज्ञ हैं और सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। पाचवंे सदस्य प्रशांत भूषण के पिता शांतिभूषण हैं जो कि जाने माने विधि विशेषज्ञ हैं और देश के विधि मंत्री रह चुके हैं। कुछ अन्य सदस्य मनीष सिसोदिया आदि हैं। यह कोर कमिटी है अन्ना के उस संगठन की, जिसे सिविल सोसाइटी का नाम दिया गया है। वैसे आंदोलन का नाम इंडिया अगेन्स्ट करप्शन दिया गया है।
बहरहाल, सरकार ने जो लोकपाल तैयार किया और अन्ना की टीम ने जो लोकपाल तैयार किया था, दोनों में काफी फर्क हो गया। सच तो यह है कि सरकार ने जनता को उल्लू बनाने के लिए लोकपाल बिल तैयार किया था। इसे सरकारी लोकपाल कहा गया और टीम अन्ना द्वारा तैयार बिल को जन लोकपाल का नाम दिया गया। सरकारी लोकपाल में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को इसके दायरे से बाहर रखा गया जबकि जन लोकपाल में इन दोनों को इसके दायरे में रखने की बात कही गयी। सरकारी लोकपाल में सर्वोच्च स्तर के अधिकारियों को ही इसके दायरे में रखा गया जबकि जन लोकपाल में सभी सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों को इसके दायरे में रखने की बात की गयी। सरकारी लोकपाल के अनुसार सूचक की शिकायत अगर सही नहीं साबित हो पाती तो उसे छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा हो सकती है जबकि भ्रष्टाचारियों के प्रति काफी नर्म रूख रखा गया। जन लोकपाल में सूचक के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है और भ्रष्टाचारियों के प्रति कड़ा रूख है। सरकारी लोकपाल में विभागीय अनुशंसा के बाद ही लोकपाल जांच कर सकता है जबकि जन लोकपाल प्रभुत्वसंपन्न है। उसे किसी की आज्ञा की जरूरत नहीं है। सरकारी लोकपाल में पुलिसिंग और जांच एजेंसी के नाम पर टालमटोल है जबकि जन लोकपाल में सीबीआई को लोकपाल के अधीन रखने की बात कही गयी है। इस तरह से कई विरोधाभास दोनों बिलों में हैं।
सरकार ने जन लोकपाल बिल को सिरे से खारिज कर दिया। दूसरी ओर अन्ना ने घोषणा कर दी कि वे संसद में सशक्त लोकपाल विधेयक लाये जाने के लिए 16 से आमरण अनशन करेंगे। सरकार ने इसे हल्के में लिया क्योंकि इस दौरान एक बड़े आंदोलन को सरकार ने दमनपूर्वक कुचल दिया था। वह था योगगुरू रामदेव का आंदोलन। विदेश में जमा कालेधन को देश में लाये जाने की मांग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान पर 1 जून 2011 से अन्ना ने भारी भीड़ के साथ आंदोलन शुरू किया। चार दिनों तक कई नाटकीय घटनाएं घटीं। चार जून को पुलिस ने आधी रात को आंदोलन पर हमला कर दिया और आंदोलनकारियों को खदेड़ दिया। रामदेव को भी दिल्ली से तड़ीपार कर दिया गया। कई आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हुए। लेकिन सरकार आंदोलन खत्म करने में सफल रही। इससे सरकार का हौसला काफी बढ़ गया। यही वजह रही कि सरकार ने अन्ना के आंदोलन की घोषणा को हल्के में लेती रही। दूसरी ओर अन्ना के सहयोगी लगातार देश भर का दौरा कर लोगों को जागरूक करते रहे। उन्होंने प्रत्येक राजनीतिक दलों से मुलाकात की। सभी समाचार चैनलों पर जाकर बहस और विमर्श में हिस्सा लिया। मामला गरमाया रहा। वैसे भी भ्रष्टाचार वह विषय है जो आज भारतवासियों को सबसे अधिक पीड़ा दे रहा है। इसलिए अन्ना में लोागों को उनकी लड़ाई लड़ने वाला नजर आने लगा। लोग उनसे जुड़ते गय। मीडिया ने भी भरपूर साथ दिया। आईटी तकनीकों की भी पूरी मदद ली गयी।
अगस्त का पहला सप्ताह बीतते-बीतते सरकार भी आंदोलन की गंभीरता को कुछ-कुछ समझने लगी। उसने राजनीतिक पैंतरा चलते हुए अपने मंत्रियों और कांग्रेस प्रवक्ताओं को टीम अन्ना की छवि लोगों के बीच खराब करने के लिए उतार दिया। इन लोगों ने टीम अन्ना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। परंतु, असर इसके ठीक विपरीत हुआ। वे अन्ना व उनकी टीम के विरूद्ध तो कुछ साबित कर नहीं पाये, उल्टे जनता में यह विश्वास पक्का होता गया कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के कारण ईमानदार लोगों को झूठा बदनाम कर रही है। मीडिया ने भी इस मुद्दे पर सरकार व कांग्रेस की खूब फजीहत की। स्थिति यह हो गयी कि सरकार ने बैठक कर फैसला किया कि टीम अन्ना पर किसी प्रकार का जबानी हमला न किया जाए। सरकार अब दूसरी चालें चलने लगी। उसके निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने टीम अन्ना को जंतर-मंतर पर अनशन करने की अनुमति देने से मना कर दिया। इसकी जगह उन्हें जेपी पार्क का प्रस्ताव दिया, लेकिन 22 शर्तों के साथ। इनमें से 16 शर्तें तो टीम अन्ना ने मान ली, परंतु छह शर्तों को अलोकतांत्रिक बताते हुए उन्हें मानने से इनकार कर दिया।
इनमें अधिक से अधिक पांच हजार लोगों को ही आंदोलन में शामिल होने, कोई टेंट या शामियाना नहीं लगाने, पांच सौ से अधिक गाड़ी पार्क नहीं करने, लाउड स्पीकर नहीं बजाने, तीन दिन से अधिक अनशन नहीं करने आदि की शर्तें थीं। जहिर सी बात है कि सरकार पहले कानून का दुरूपयोग कर अन्ना के आंदोलन को शुरू होने से पहले ही खत्म कर देना चाहती थी। टीम अन्ना ने इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। इस तरह से सरकार के इशारे पर दिल्ली पुलिस ने जेपी पार्क भी टीम अन्ना को देने से इनकार कर दिया। अन्ना की टीम जगह की इजाजत के लिए महीने भर दिल्ली में विभिन्न सरकारी विभागों की खाक छानते रहे। अन्ना ने 13 अगस्त को प्रधानमंत्री को भी जमीन की इजाजत देने के लिए चिट्ठी लिखी। सरकार भला क्यों मदद करती। आखिर उसी के इशारे पर यह हो ही रहा था। पीएम की ओर से जवाब दिया गया कि जमीन की इजाजत के लिए दिल्ली पुलिस के पास जाएं। मजबूरन अन्ना ने घोषणा कर दी कि चाहे जो हो वे तयशुदा कार्यक्रम के तहत 16 अगस्त को जेपी पार्क में अनशन करने जाएंगे। सरकार यदि उन्हें गिरतार करेगी, तो वे जेल में ही अनशन करेंगे। सरकार भी अन्ना के आंदोलन को कुचलने की साजिश रचने लगी।
लेकिन सरकार की मुश्किलें इससे कम होने वाली नहीं थी। सदियों से भ्रष्टाचार की चक्की में दिन-रात हर कदम पर पिस रही जनता आंख खोलने लगी थी। 15 अगस्त को अन्ना के आह्वान पर लोगों ने रात में 8 से 9 बजे तक बत्तियां बुझायीं। अन्ना के प्रति जनता का समर्थन देखकर सरकार ने जेपी पार्क पर 15 अगस्त की शाम को धारा 144 लागू कर दिया। वहां भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया। अन्ना ने समाचार चैनलों के माध्यम से लोगों को गिरतारी देने का आह्वान किया। सरकार भी विभिन्न शहरों में वैसे स्थान चिह्नित करने में लग गयी, जहां गिरतारी के बाद लोगों को रखा जा सके। सरकार की योजना यह थी कि गिरतारी के भय से लोग आंदोलन में भाग लेने से परहेज करेंगे।
16 अगस्त को सरकार ने इमरजेंसी को दुहराना शुरू किया। सुबह करीब सवा सात बजे अन्ना अभी अपने निवास से बाहर भी नहीं निकले थे कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें और उनके साथियों को यह कहते हुए हिरासत में ले लिया कि उनके बाहर रहने से शांति व्यवस्था को खतरा है। तुरंत यह खबर पूरे देश में फैल गयी। लोग और अधिक आक्रोश के साथ देश भर में सड़कों पर उतर आये। लोगों ने अपनी गिरतारियां देनी शुरू कर दी। अभी भी सरकार अपनी शक्ति के घमंड में चूर थी। उसने दोपहर करीब दो बजे अन्ना सहित उनके आठ साथियों पर धारा 107 और धारा 151 लगाकर गिरतार कर लिया। उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने उन्हें निजी मुचलके पर जमानत देने की बात कही, परंतु टीम अन्ना ने जमानत लेने से इनकार कर दिया। सरकार का ख्याल था कि टीम अन्ना गिरतारी से घबराकर जमानत ले लेगी और इस तरह वह जन आंदोलन को आसानी से कुचल देगी। लेकिन टीम अन्ना की चालाकी से सरकार के सारे दावं उल्टे पड़ते जा रहे थे। टीम अन्ना को सात दिनों की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। दूसरी ओर अपनी गिरतारी देने के देश भर में लोगों की भारी भीड़ सड़कों पर लगातार बढ़ती जा रही थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र अन्ना के पक्ष में सड़क पर उतर आये। कई जगह हाई कोर्ट और सिविल कोर्ट के वकीलों ने दिन भर के लिए अदालत का कामकाज ठप कर दिया। कई संगठन सरकार के विरोध में उतर गये। देश का शायद ही कोई ऐसा शहर होगा, जहां लोगों ने विरोध प्रदर्शन न किया हो। ऐसा लगा मानों पूरा देश सड़क पर आ गया हो।
टीम अन्ना हर पहलू पर विचार कर आगे बढ़ रही थी। उनकी टीम को पहले ही शक था कि सरकार यह कदम उठा सकती है। लिहाजा अन्ना ने रात में ही एक अपने भाषण का वीडियो सीडी तैयार कर लिया था। उसमें भाषण इस तरह से दिया गया था मानों वे गिरतारी के बाद भाषण दे रहे हों। उसमें अन्ना ने देशवासियों से आंदोलन को शांतिपूर्ण ढंग से जारी रखने का आह्वान किया था। उनकी हिरासत में लिये जाने के कुछ ही देर बाद यह सीडी सभी समाचार चैनलों में पहुंचा दिया गया। सभी चैनल अन्ना का संदेश प्रसारित करने लगे। सरकार हर कदम पर मात खाकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी। इसी मुद्दे पर हंगामे के कारण संसद के दोनों सदन दिन भर के लिए स्थगित हो गये। लोगों ने इतनी गिरतारियां दीं कि दिल्ली का छत्रसाल स्टेडियम और मुंबई का आजाद पार्क जहां आंदोलनकारियों को गिरतार करके रखा जाना था, छोटे पड़ गये। जैसे ही लोगों को यह पता चला कि अन्ना को तिहाड़ जेल में रखा गया है, हुजूम टूट पड़ा। देखते ही देखते तिहाड़ जेल के चारों ओर दसियों हजार की भीड़ उमड़ पड़ी। उन्नत सूचना तंत्र ने जन ज्वाला को ज्वालामुखी बना डाला। सरकार के हाथ पांव फूलने लगे। शाम करीब पांच बजे तिहाड़ में उनकी रिहाई के आदेश पहुंच गये। परंतु फिर अन्ना के सामने सरकार की रणनीति छोटी पड़ गयी। सरकार की ओर से सफाई देने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने प्रेस कांफ्रेस की। उन्होंने कई तर्क देकर इस दमन को सही ठहराने की कोशिश की। जनता ने इसे बकवास के सिवा और कुछ नहीं माना।
बिहार की राजधानी पटना में भी शहर भर में विरोध के नारे गूंजे। दर्जन भर संगठनों ने अनशन की घोषणा कर दी। सभी स्थानीय समाचार आंदोलन को लाइव प्रसारित करने लगे। पीएमसीएच के जूनियर डाक्टरों ने रैली निकाली। कई जगह प्रधानमंत्री के पुतले फंूके गये। गांधी मैदान के पास करगिल चैक प्रदर्शनकारियों से पट गया। भोजपुरी गायक व अभिनेता मनोज तिवारी पटना की सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन किया।
दिल्ली में अन्ना की रिहाई के आदेश के बाद तिहाड़ के बाहर लोग अन्ना के बाहर आने का इंतजार करने लगे। शाम करीब साढ़े सात बजे तक स्पष्ट हुआ कि अन्ना और उनके साथियों ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया है और वे जेल में ही अनशन पर हैं। सरकार की सांसें फिर अंटक गयी। अन्ना ने जेल से बाहर आने के लिए बिना शर्त उन्हें अनशन करने देने की शर्त रखी। अब हर कदम पर घुटने टेकने की बारी सरकार की थी। बहरहाल, रात भर अन्ना अपने साथियों के साथ तिहाड़ में ही रहे और तिहाड़ के बाहर जनता रात भर जेल को घेरे रखी। अन्ना अब जेल में कैदियों की कोठरी के बजाय जेल उपायुक्त के कक्ष में आ गये थे। टीवी चैनलों ने इस मसले पर अपने दिन और रात कुर्बान कर दिये। विपक्ष इस मसले पर सदन में प्रधानमंत्री के वक्तव्य की मांग पर अड़ गया। अन्ना के मान मनौव्वल का दौर लगातार चलता रहा। रात इसी तरह बीती।
अगले दिन की हालत भी इससे जुदा नहीं थी। सुबह करीब आठ बजे अन्ना के एक साथी मनीष सिसोदिया जेल से बाहर आये और उन्होंने अन्ना का संदेश सुनाया। उन्होंने कहा कि अन्ना अनशन पर हैं और पूरी तरह स्वस्थ हैं। उन्होंने तब तक जेल से बाहर आने से मना कर दिया है जब तक कि उन्हें बिना शर्त अनशन की इजाजत नहीं दे दी जाती। अन्ना ने लोगों को तिहाड़ के बाहर ही आंदोलन पर बैठने का आग्रह किया है। इस दिन अर्थात 17 अगस्त का नजारा कहीं से भी पिछले दिन से सहज नहीं था, बल्कि बढ़कर ही था। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने कार्य बहिष्कार कर दिया। अन्ना से समझौते की लगातार पेशकश की जाने लगी। दिन में अन्ना से मिलने श्रीश्री रविशंकर, योगगुरू रामदेव आदि पहुंचे। आखिरकार सरकार ने अन्ना की सारी शर्तों के आगे सिर झुका दिया। तय हुआ कि दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन होगा। 15 दिन अनशन की इजाजत मिल गयी। लेकिन रामलीला मैदान की हालत बारिश के कारण बदतर थी। उसे तैयार करने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हो गया। अन्ना इस दिन भी तिहाड़ में ही रहे। देश भर में प्रदर्शनों का दौर जारी रहा। अतरराष्ट्रीय मीडिया में भी अन्ना की चर्चा खूब होने लगी।
संसद में प्रधानमंत्री ने बयान दिया। उन्होंने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष ने उनकी दलीलों की धज्जियां उड़ा दी। लोकसभा व राज्यसभा में सरकार की ऐतिहासिक किरकिरी हुई। हां, भ्रष्टाचार में डूबे कुछ नेताओं ने अन्ना के आंदोलन को यह कहकर गलत ठहराने की कोशिश की कि उनके तरीके से देश के लोकतंत्र को खतरा है। परंतु, जनता ने इसे अनर्गल प्रलाप ही माना। 17 की रात में ही करीब दो बजे अन्ना को सरकारी डाक्टरों से झूठी रिपोर्ट बनवाकर जेल से निकालने की कोशिश भी की गयी। परंतु वहां भीड़ ने इस मंसूबे को पर पानी फेर दिया।
18 अगस्त को भी मैदान तैयार नहीं हो सका और अन्ना जेल में ही रहे। समाचार चैनलों ने अपने अन्य सारे कार्यक्रम रद्द कर इस जन आंदोलन पर अपना सारा ध्यान फोकस कर दिया। इसी बीच किरण बेदी ने मोबाइल पर अन्ना का वीडियो इंटरव्यू कर उसे यूट्यूब पर अपलोड कर दिया। उसे सभी चैनल प्रसारित करने लगे।
अब भ्रष्टाचार से उबी जनता दिल्ली में व देश भर में रोज एक नया इतिहास लिखने लगी। 19 अगस्त को दिन के करीब 11 बजे अन्ना तिहाड़ जेल से बाहर निकले। बाहर देश भर से इकट्ठा भारी जनसमुदाय ने जयघोष किया। तिहाड़ से अन्ना एक खुले ट्रक पर अपने कुछ सहयोगियों के साथ पहले राजघाट के लिए रवाना हुए। समर्थकों की भीड़ के कारण मायापुरी तक करीब डेढ़ किलोमीटर जाने में ही तीन घंटे से अधिक लग गये। वहां से वे कार से बापू की समाधि स्थल राजघाट गये। वहां भी समर्थकों की भारी भीड़ जमा थी। वहां से रामलीला मैदान पहुंचे। उस समय जमकर वर्षा हो रही थी। लेकिन इससे न अन्ना परेशान हुए न ही वहां मौजूद हजारों समर्थकों का हौसला कम हुआ। बारिश में भिगते हुए अन्ना ने देश को संबोधित किया। उन्होंने साफ कर दिया कि इस बार आरपार की लड़ाई होगी। मैदान में भारी दिक्कतों का सामना करते हुए भी समर्थक बड़ी संख्या में रामलीला मैदान में जमे रहे।
पटना में भी गांधी मैदान व अन्य जगहों पर अन्ना के समर्थन में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहा। जनता के उत्साह की बानगी देखिए। 19 अगस्त को पटना के भिखना पहाड़ी मोड़ पर रामरूप मेहता यूनिवर्सल फाउंडेशन के तत्वावधान में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। न माईक न पूर्व में कोई घोषणा। ऐसे ही एक बैनर टांक कर दो-तीन कार्यकर्ता बैठ गये। बिना कुछ कहे करीब 1800 सौ लोगों ने अन्ना के आंदोलन के समर्थन में हस्ताक्षर किये। इनमें 1700 से अधिक विद्यार्थी थे। शाम में इसी संगठन के नेतृत्व में भिखना पहाड़ी से करगिल चैक तक कैंडिल मार्च का आयोजन किया गया। उसमें भी करीब एक सौ छात्रों ने भाग लिया। एक चीज साफ तौर पर महसूस हुआ कि बिहार में जन लोकपाल बिल को लेकर जागरूकता की कमी रही। गिने-चुने लोगों को ही पता है कि आखिर जन लोकपाल बिल क्या है और यह सरकारी लोकपाल बिल से किस तरह अलग है।
सरकार को उम्मीद थी कि यह जन आंदोलन जनता की तत्कालिक प्रतिक्रिया है। और अब लोग इसका समर्थन बंद कर अपने-अपने कामों में लग जाएंगे। लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा। 20 अगस्त को रविवार का दिन था। सुबह से ही रामलीला मैदान में अन्ना के समर्थकों की भीड़ जुटने लगी। दोपहर में मंच से घोषणा की गयी कि आज शाम पांच बजे से इंडिया गेट से रामलीला मैदान तक रैली निकाली जाएगी। रैली में इतने लोग शामिल हुए कि सरकार के हाथ पांच फुल गये। लोगों की भीड़ मीडिया के कैमरे की क्षमता से अधिक हो गयी। परंतु, पूरी तरह अनुशासित व अहिंसक। जब यह रैली रामलीला मैदान पहुंची तो वहां जगह कम पड़ गयी। लोगों की संख्या लाख पार कर चुकी थी। रामलीला मैदान से बाहर हजारों की तादात में लोग रह गये। बताया गया कि आजादी के बाद इस तरह की भीड़ शायद ही कभी रामलीला मैदान में हुई हो। अन्ना हजारे ने भी भीड़ को संबोधित किया। अन्ना ने खास तौर पर यह कहा कि लोग अपने-अपने क्षेत्र के सांसदों के घर पर धरना दें और उनसे जन लोकपाल बिल का समर्थन करने को कहें। कुछ ही देर के बाद यह कार्यक्रम जनता ने शुरू कर दिया। पीएमओ व कपिल सिब्बल के घर के बाहर धरने पर बैठे लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। अन्ना और सरकार के बीच मध्यस्थता करने श्रीश्री रविशंकर, महाराष्ट्र के वरीय आईएएस उमेश सारंगी व आध्यात्मिक नेता रज्जु भैया आदि पहुंचे। दुर्भाग्यवश सरकार अभी भी अपने हठ पर थी।
दिल्ली के अलावा अन्य शहरों में भी रैलियां निकाली गयीं। मुंबई में निकली रैली भी किसी मायने में दिल्ली की रैली से कम न थी।
अगले दिन अर्थात 22 अगस्त को भी स्थिति वैसी ही रही। अन्ना के अनशन का यह सातवां दिन था। अन्ना को मनाने की कोशिशें तेज हो गयी। दूसरी ओर जनता अपने सांसदों के घर पर पहुंचकर अन्ना के समर्थन में धरना देने लगी। पीएम आवास आदि कुछ जगहों पर धारा 144 लगा दी गयी। सांसदों के घरों के आगे बैठे धरनार्थियों को हिरासत में लिये जाने पर कई जगह प्रतिक्रियाएं हुईं। अरविंद केजरीवाल ने इसपर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कैसा लोकतंत्र है, जहां जनता अगर अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से मिलने जाती है तो उसे हिरासत में लिया जाता है। इस बीच किरण बेदी व अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में जन लोकपाल बिल के बारे में लोगों को बताते रहे। आज मशहूर गायक कैलाश खेर भी रामलीला मैदान पहुंचे और अन्ना के समर्थन में कई गाने गाये।
आज कृष्ण जन्माष्टमी भी है। यह पर्व भी इस बार पूरी तरह अन्ना के आंदोलन के रंग में रंगा दिखा। खास बात यह कि अब तक पूरा देश गांधी टोपी पहने नजर आने लगा। फर्क यह है कि टोपी पर मैं अन्ना हूं आदि संदेश लिखे रहते हैं। यहां तक कि अभी इंग्लैंड के ओवल में भारत व इंग्लैंड के बीच हो रहे टेस्ट मैच में भी भारतीय दर्शक बड़ी संख्या में अन्ना की टोपी पहने दिखे। दूसरी खास और आश्चर्य वाली बात यह कि राहुल गांधी अभी तक इतने बड़े मामले में एक शब्द भी नहीं कहा। शर्मनाक है कि लोग उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं।
आज अनशन के सातवें दिन पहली बार अन्ना कमजोरी के कारण सभा को संबोधित नहीं कर सके। डाक्टरों ने उनकी नियमित जांच के बाद कहा कि उनके खून व पेशाब में किटोन की मात्रा पायी गयी है।
23 अगस्त को अन्ना की तबीयत थोड़ी खराब होने लगी। अन्ना के मसले पर संसद में इतना हंगामा हुआ कि दोनों सदन अगले दिन तक के लिए स्थगित करने पड़े। सरकार में कई स्तर पर बात होने लगी। शाम में टीम अन्ना को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बातचीत के लिए आमंत्रित किया। उसमें अन्ना की ओर से अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी व प्रशांत भूषण ने हिस्सा लिया। बातचीत आंशिक रूप से सफल रही लेकिन पूरी तरह नहीं। सरकार सिटीजन चार्टर, निचले स्तर के कर्मचारी व राज्यों में लोकायुक्त नियुक्त करने पर तैयार नहीं हुई। न्यायपालिका को लेकर इस बात पर सहमति बनी कि लोकपाल के साथ ही न्यायपालिका जवाबदेही बिल भी संसद में पेश होगा। इस बिल से सिविल सोसाइटी की सहमति आवश्यक होगी।
डाक्टरों ने अन्ना की नियमित जांच कर कहा कि उनकी किडनी में खराबी आने लगी है। उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। अन्ना ने इससे साफ इंकार कर दिया। डाक्टर जब उन्हें ग्लूकोज वहीं चढ़ाने लगे तो उन्होंने उससे भी इंकार कर दिया। इसके कुछ देर बाद उन्होंने सभा को संबोधित किया। अन्ना ने अपने समर्थकों से कहा कि संभव है, सरकार उनकी बीमारी का बहाना कर यहां से दूसरी जगह ले जाना चाहे, परंतु सभी लोग दरवाजा के पास खड़े हो जाएं। उन्हें मैदान से नहीं ले जाने दें।
सरकार से बातचीत अगले दिन 24 अगस्त को भी जारी रही। लेकिन इस बार सबकुछ बदला-बदला सा था। सरकार एक दिन पहले किये गये वादे से मुकर गयी। बैठक के बाद प्रणब मुखर्जी ने प्रेस को बताया कि बातचीत साकारात्मक रही। उसके तुरंत बाद सिविल सोसायटी की ओर से बातचीत में शामिल अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी व प्रशांत भूषण ने बाताया कि बातचीत टूटने के कगार पर है। सरकार ने जो मांगें कल मान ली थी, आज वह उससे भी सहमत नहीं है। किरण बेदी ने कहा कि आज उनसे बातचीत करने के बजाय उन्हें डांटा जा रहा था। यहां तक कि सरकार का अन्ना के अनशन के बारे में कहना है कि यह उनलोगों और अन्ना की समस्या है। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि कपिल सिब्बल व पी चिदंबरम नहीं चाहते की बातचीत हो। कल की बातचीत में ही उन्हें प्रणब मुखर्जी ने बताया था कि वे दोनों बातचीत के सख्त खिलाफ हैं। श्री केजरीवाल ने कहा कि हम फिर पहले दिन वाली स्थिति में हैं। रामलीला मैदान में समर्थकों को सारी बातें बतायी गयीं। उन्हें सरकार के लगातार बदलते रुख से यह भी चिंता होने लगी कि कहीं पुलिस कार्रवाई कर सरकार आंदोलन को कुचलने के लिए उन सभी को गिरतार न कर ले। अन्ना ने अपने समर्थकों से कहा कि अगर पुलिस उन्हें ले जाए तो कोई रोके नहीं क्योंकि सरकार हिंसा का षड्यंत्र कर सकती है। फिर भी समर्थक सारी रात मंच के चारों ओर घेरा बनाकर सोये।
अन्ना का अनशन 25 अगस्त को 10वें दिन में प्रवेश कर चुका था। देश भर में उत्तेजना फैलने लगी थी। मामले की गंभीरता देख महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में केंद्र में मंत्री विलासराव देशमुख को मध्यस्थता के लिए बुलाया गया। उनसे अन्ना ने कहा कि अगर संसद से सिटीजन चार्टर, लोकायुक्त और सभी सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में रखने के लिए प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो वे अपना अनशन समाप्त कर देंगे। सरकार इस पर मान गयी। शाम में अरविंद केजरीवाल व प्रशांत भूषण ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, आडवाणी, सुषमा स्वराज व अरूण जेटली से मुलाकात कर उनसे बात की। भाजपा जन लोकपाल के सभी मुद्दों पर सहमत हो गयी। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी एक समाचार चैनल पर घोषणा की कि पार्टी जन लोकपाल का संसद में समर्थन करेगी। यह माना जाने लगा कि अगले दिन प्रस्ताव पारित हो जाएंगे और अनशन टूट जाएगा।
26 अगस्त को कांग्रेस ने फिर अपना दोगला चरित्र दिखाया। उसने संसद में चर्चा के लिए प्रस्ताव ही नहीं लाया जबकि तीन मंत्री चर्चा का नोटिस दे चुके थे। सुबह संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि अभी तक सदन को चर्चा के लिए किसी ने नोटिस नहीं दिया है। लिहाजा आज चर्चा नहीं भी हो सकती है। नोटिस दिये जाने के बाद पूरे देश की निगाहें संसद पर टिकी थीं। परंतु, शासक फिर जनता को अपनी शक्ति और क्षमता दिखाने में लग गये।
27 अगस्त को आखिरकार संसद में उक्त तीनों प्रस्तावों पर चर्चा शुरू हुई। देर शाम तक चर्चा चलती रही। लालू को छोड़कर सभी नेताओं ने प्रस्ताव पर सहमति जतायी। पारित प्रस्ताव की प्रति लेकर रात करीब नौ बजे विलासराव देशमुख अन्ना के पास पहुंचे। अन्ना ने कहा कि वे शाम छह बजे के बाद अनशन नहीं तोड़ते, लिहाजा वे कल दस बजे अनशन तोड़ेंगे। उन्होंने देश के लोगों को संदेश दिया कि वे इस जीत का शांतिपूर्वक जश्न मनाएं। रात से ही पूरे देश में आतिशबाजी, रंग-गुलाल शुरू हो गया। पारित प्रस्ताव संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया।
28 अगस्त को वह ऐतिहासिक घड़ी आयी, जब अन्ना हजारे ने अनशन खत्म किया। रामलीला मैदान समर्थकों से ठसाठस भरा हुआ था। मंच पर अन्ना अपनी टीम व कुछ छोटे बच्चों के साथ बैठे थे। सभा को पहले अरविंद केजरीवाल ने संबोधित करते हुए सभी सांसदों, समर्थकों, पुलिसकर्मियों व अन्य सभी के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने उपस्थित लोागों को जीवन में कभी भी न तो रिश्वत लेने और न ही रिश्वत देने की शपथ दिलायी। दिन के 10 बजकर 19 मिनट पर अन्ना ने दलित बच्ची सिमरन व मुस्लिम बच्ची इरका के हाथों नारियल पानी व शहद पीकर 13वें दिन अपना अनशन तोड़ा।
इस मौके पर उन्होंने कहा कि यह अभी आधी जीत है। उनकी लड़ाई देश में व्यवस्था परिवर्तन करने तक चलती रहेगी। उन्होंने कहा कि अगली लड़ाई राइट टू रिकाल, राइट टू रिजेक्ट आदि को लेकर होगी। खास बात यह भी रही कि अनशन के पाचवें दिन छोड़कर बाकी सभी दिन वे समारोह को संबोधित करते रहे।
अनशन तोड़ने के बाद वे डा नरेश त्रेहन के गुड़गांव स्थित मेदांता हास्पीटल में स्वास्थ्य लाभ के लिए भर्ती हो गये। उस दिन भी उनका रक्तचाप सामान्य ही था, केवल नाड़ी की गति तेज थी। रामलीला मैदान से मेदांता हास्पीटल तक पूरे रास्ते जनसमूह उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। जैसे ही लोगों को भनक लगी कि अन्ना मेदांता हास्पीटल में भर्ती होंगे, लोग बड़ी संख्या में वहां इकट्ठा हो गये। स्थिति यह हो गयी कि उनकी गाड़ी को हास्पीटल तक पहुंचला मुश्किल हो गया।
सुधीर
1 टिप्पणी:
very nice..........
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