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सोमवार, 3 अगस्त 2015

आदरणीय अन्ना हजारे जी को चिट्ठी


आदरनीय अन्ना हजारे जी
सादर परनाम
आपको मालूम हो कि हम कुशल हैं और आपकी कुशलता चाहते हैं। आशा करते हैं कि आप भी कुशल और स्वस्थ होंगे।

आपको मालूम हो कि हम कई दिन से आपको चिट्ठी लिखे लागी सोच रहे थे, लेकिन टाइम नहीं मिलने और कभी मूड नहीं होने के कारण नहीं लिखे। लेकिन अब लिखे बिना मन नहीं मान रहा है, इसलिए लिख रहे हैं। हमको ई भी नहीं पता है कि ई चिट्ठी आप तक पहुंचेगी कि नहीं। बाकी लिखना बहुते जरूरी बुझा रहा है, इसलिए लिख रहे हैं।

आपको मालूम कि हम आपके आंदोलन में, जब आपको जेहल में डाल दिया गया था, सड़क पर उतरे थे। नारा भी लगाये थे और गांधी मैदान के किनारे करगिल चौक के पास भाषण भी दिये थे। हमारे साथ हमारे कई दोस्त भी ओकरा में सामिल हुए थे। अपन मोबाइल से आपके आंदोलन के समर्थन में बहुत सा मैसेज भी किए थे।
आपको मालूम कि आप बोलते थे कि लोकपाल लागू हो जाने से भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी। समुले भ्रष्टाचार नहीं खतम होगा, तइयो ढेरे खतम हो जाएगा। बाद में यूपीए ओला लोकपाल के आप सही मानके सहमति भी दे दिये। कह दिये कि मोटामोटी आपका लोकपाल भी एही था।

अन्ना हजारे साहेब। आपको मालूम हो कि इससे कोची बदलाव हुआ, ऊ हमनी के आझु तक एको पइसा समझ में नहीं आया। हमनी के तो कनहूं कोनो फरके न बुझा रहा है।

आपको मालूम कि सब जगह पहिलहीं जइसा कमीशनखोरी आऊ रिश्वतखोरी चल रहा है। ढेरे जगह तो पहिले से जादे बढ़ गया है। घूस नहीं देंगे तो हमनी के कोनो कामे नहीं होगा। जीना मोहाल हो जाएगा।

आपको मालूम कि बिना दलाल के पकड़ले आय, जाति और आवासीय सर्टिफिकेट तक नहीं बन रहा है। कर्मचारी अपन खर्चा पानी लेले बिना खेत के रसीद नहीं काटता है। एलपीसी बनावे के तो खुला रेट चल रहा है। बैंक ओलन सौ बार दउड़एला के बादो केसीसी बिना दलाल के नहीं बनाता है।

आपको मालूम कि मुखिया लोग इंदिरा आवास के भी रेट भी बढ़ा दिया है। कहता है कि पहिलका रेट में पोसाई नहीं पड़ता है। कमीशन देवे से मना किये तो ई बार हमनी के फसल छति ओला मुआवजा खाली अखबारे में मिल के रह गया। रासन किरासन भी दो-दो तीन-तीन महीना पर मिल रहा है। ओकरो में डीलर के जेतना मन करता है, ओतने देता है।

ई तो बेक्तिगत काम के बता रहे हैं। सरकारी काम में तो भ्रष्टाचार के कोनो सीमे नहीं है। पंचायत भवन में छत नहीं है। 10 फीट के खड़ौंजा आऊ पीसीसी दू फीट में बना के ठेकेदार आऊ ओभरसियर पूरा पइसा भंजा ले रहा है। मुखियाजी के चांपाकल से पानी उनका बिल भंजे के दिन तक ही गिरता है। आऊ सोलर लाइट तो लगावते-लगावते बुत जाता है। केतने पुल आऊ सड़क कागजे पर बन के खतम हो गया। हॉस्पीटल के दवाई बजार में बिका रहा है।
आपको मालूम हो कि बिना सलामी देले थाना में अभियो एफआईआर नहीं लिखाता है। पैरवी-उरवी से लिखाइयो गया तो फिर कोनो कार्रवाई नहीं होती है। पइसा देके अभियुक्त के नाम केस से हटा दिया जाता है आऊ ओइसहीं डाइरी भी लिखाता है। पंडीजी बियाह सादी में डेगेडेग ओतना पइसा नहीं मांगते हैं, जेतना कोट-कचहरी में मांगता है। एकरा बादो बात-बात पर जेहल में ढुकावे के धमकी देता है।

आपको मालूम कि अभी कहेंगे तो कहेला बड़ी बात बाकी है। इसकूल में माट साब मीड डे मील, छात्रवृत्ति आऊ पोसाक रासि के पइसा में घोलटनियां मार रहे हैं। आंगनबाड़ी के हाल भरसक तो आप भी जानते होंगे। साइकिल ओला पइसा कुछ मासटर साहेब रख ले रहे हैं आऊ लइकन फर्जी बिल देखा के बचल पइसा ले रहा है। ओहू पइसा से ढेरे लइकन साइकिल के बजाय मोबाइल खरीद ले रहा है। बड़का-बड़का घोटाला तो आप अखबार में पढ़बे करते होंगे। नया पुल उद्घाटन से पहिलहीं ढह जाता है तो मंत्री जी कहते हैं कि नदी के बदमासी है।

हम कहां सिकाइत करें, पते नहीं चल रहा है। आपका लोकपाल कहां बइठा है, कोनो ठिकने नहीं है। कुछो करके भ्रष्टाचार तनियोमानी कम करवाइये। आप ई मामला में बहुते बड़का नाम हैं। अगर एही हाल रहा तो बाद में सोचिए क्या होगा।

कोनो आदमी भविष्य में कहियो भ्रष्टाचार हटावे के नाम लेगा चाहे आंदोलन करेगा तो सब आपका परतुक देके उसका मजाक उड़ाएगा। कुछो कीजिए न अन्ना हजारे जी!

अब आऊ कोची लिखें। गलती-सलती माफ कीजिए। कम को अधिक समझिए।

बड़ों को परनाम आऊ छोटों को सुभ प्यार
                               आपका एगो परसंसक

                                    सुधीर

रविवार, 11 मई 2014

चुनाव में बाथे...

इन गलियों में खेला गया  था खूनी खेल
लोकसभा चुनाव का पारा मौसम के पारे से कई गुना ऊपर चढ़ा हुआ है। सारे दल जनता को विकास और न्याय की भरोसा दिलाने में जुटे हैं। हर नेता खुद को जनता का रहनुमा साबित करने में जुटा है। दूसरी ओर लक्ष्मणपुर-बाथे के लोग 17 वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं। बात कीजिए तो पता चल जाएगा कि अब उन्हें न्याय और नेता दोनों पर ही विश्वास नहीं है।

जख्म नहीं नासूर है यह

मारे जाने वालों के नाम का बोर्ड अब ऐसा दिखता है।
17 साल पहले 01 दिसंबर 1997 की रात को बाथे मे जो हुआ, उसका दर्द आज भी महसूस किया जा सकता है। तब से कई चुनाव आए और गए, लेकिन बाथे का दर्द बढ़ते ही गया। पीड़ित परिवारों की आंखों में इंसाफ न मिलने की तड़प, गहरी मायूसी और विचलित कर देने वाला गुस्सा साफ दिखता है। जख्म होता तो भर जाता, लेकिन अदालत के फैसले ने उनके जख्म को नासूर बना दिया है। ऐसा नासूर, जिसकी टीस को लोग अब अपनी नियति मानने को मजबूर होने लगे हैं। 58 लोगों का कत्लेआम और एक को भी सजा नहीं।

किसी नेता का मुद्दा नहीं

बाथे, जहां 58 लोगों को इस गुनाह में मार दिया गया कि वे सवर्ण हिंदू नहींं थे
चुनाव में तमाम नए पुराने मुद्दे उठाए जा रहे हैं। लेकिन, बाथे किसी का मुद्दा नहीं है। अब तक किसी प्रत्याशी ने उन्हें इंसाफ दिलाने का झूठा आश्वासन तक नहीं दिया है। कोई नेता उन्हें इंसाफ दिलाने की बात नहीं करता। हालत यह है कि अधिकांश प्रत्याशी यहां वोट तक नहीं मांगने आते। शायद इसका कारण यह भी हो कि प्रत्याशियों में से जीत के दो प्रमुख दावेदार आरोपियों की जाति से हैं। नरसंहार में अपने भाई बीजेंद्र ठाकुर को खो चुके नरेंद्र ठाकुर कहते हैं कि उन्हें तो पता ही नहीं चला कि इस बार चुनाव प्रचार कैसे हो रहा है। वो कहते हैं कि कोई भी प्रत्याशी उनके गांव में नहीं आया। कभी-कभी उनके कार्यकर्ता (उन्होंने कहा चमचे) आए थे। लेकिन उन्हें इंसाफ दिलाने की बात किसी ने नहीं की। मानो नेताओं ने भी बाथे को उसके दुर्भाग्य पर आंसू बहाने को छोड़ दिया है। यहां लोगों को सबसे अधिक मायूसी तो नेताओं से ही है ।
माले ने मरने वालों की याद में यह स्मारक बनवाया है।

तीनों प्रमुख दल यहां नंगा हो जाते हैं

बिहार में तीन प्रमुख दल चुनाव लड़ रहे हैं। बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी। बीजेपी हिंदू रक्षा की बात करती है। बिहार में कई दंगे हुए। कभी भी 58 हिंदुओं की हत्या मुसलमानों ने नहीं की। लेकिन यहां हिंदुओं ने ही 58 हिंदुओं को रातोंरात मौत के घाट उतार दिया। अगर दो-चार हिंदुओं की हत्या किसी भी मुद्दे पर मुसलमानों के हाथों हो जाए तो संभवतः बीजेपी पूरे बिहार में दंगे करवा दे। लेकिन यहां 58 हिंदुओं की हत्या पर वह चुप है। यह भी ख्याल रखने वाली बात है कि हत्या के आरोपी उसी समुदाय के हैं जो सबसे अधिक हिंदू और हिंदुत्व की बात करता है। क्या बीजेपी के हिंदुत्व में 58 दलितों की सामूहिक हत्या बिल्कुल ही सामान्य बात है? वैसे हत्या के आरोपियों
बौध पासवान के परिवार के 7 लोग मारे गए थे
की जाति के ही बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ सीपी ठाकुर को यह लगता है कि 58 चमार-दुसाध की हत्या के लिए किसी को सजा देने की क्या जरूरत है। सीपी ठाकुर ने अपनी मंशा छुपाई भी नहीं। जब आरोपियों को हाईकोर्ट से रिहाई के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला किया तो सीपी ठाकुर ने इसे गलत बताया।
दूसरी पार्टी है बिहार में सत्तारूढ़ जेडीयू। न्याय के साथ विकास इसका नारा है। लेकिन यह नारा बाथे पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान लगता है। न्याय का तो यह आलम है कि इसके शासन में सभी आरोपी बरी हो गए। आखिर किसके लिए न्याय की बात करती है सरकार? और विकास का हाल वही है जो दलितों के गांवों का होता है। बिजली नहीं, शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं। रोजगार का अवसर नहीं। ऊंची शिक्षा कौन कहे, हाई स्कूल तक नहीं।

तीसरा दल है आरजेडी। इसी के शासनकाल में नरसंहार हुआ था। यह सामाजिक न्याय की बात करता है। लेकिन यहां आकर पता चलता है कि इसके मुखिया को लोग क्यों थेथरोलॉजी का मास्टर कहते हैं। इस इलाके में एक और पार्टी सक्रिय है। भाकपा माले। उसने ही यहां मारे गए लोगों की स्मृति में शहीद स्मारक बनाया है। लेकिन लोगों का मानना है कि उसने भी उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए कुछ नहीं किया। माले भी केवल वोट के लिए हमदर्दी जताती है। बस इतना समझ लीजिए कि बाथे के हमाम में सभी दल और नेता...।

जेडीयू पर सबसे अधिक गुस्सा

यह महिला नरसंहार में छिपकर बच गई थी
लोगों का सबसे अधिक गुस्सा नीतीश सरकार पर है। आरोपियों को बरी होने के पीछे सभी लोग जेडीयू को कसूरवार मानते हैं। बात कीजिए तो सभी कहेंगे कि नीतीश ने आरोपियों को बचा लिया क्योंकि उन्हीं की सरकार है। बौध पासवान आरोप लगाते हैं कि सरकार और प्रशासन आरोपियों से मिला हुआ है। यही कारण है कि सभी आरोपी बरी हो गए। ऐसा मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता था। बौध कहते हैं कि नीतीश कुमार पैसे पर बिक गए। आरोपी पैसे वाले हैं। उन्होंने सबको खरीद लिया। लोग साफ-साफ कहते हैं कि नीतीश कुमार ने आरोपियों को बचा लिया।
यह भी ख्याल रखने लायक बात है कि आरोपी संगठन रणवीर सेना से नेताओं की सांठगांठ की जांच कर रहे अमीरदास आयोग को नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाते ही भंग कर दिया था। वह भी ऐसे समय में जब आयोग अपनी रिपोर्ट देने की तैयारी कर रहा था। वैसे भी भागलपुर दंगे के गुनाहगारों को सजा दिलाने का श्रेय नीतीश कुमार खुद लेते हैं, तो फिर बाथे नरसंहार के आरोपियों को बरी करवाने के आरोप से वे कैसे बच सकते हैं?

इंसाफ की उम्मीद नहीं

बाथे के लोग इंसाफ की उम्मीद छोड़ चुके हैं। नरसंहार के वक्त छिपकर जान बचानेवाली मिंता देवी सवाल करती है कि जब सभी आरोपी घर आ चुके हैं तो अब इंसाफ कैसे मिलेगा। लगभग सभी लोग ऐसी ही बातें करते हैं। निचली अदालत में सजा पाए सभी आरोपियों को पटना हाई कोर्ट द्वारा बाइज्जत बरी कर दिए जाने पर लोग आवाक हैं। वृद्ध बौध पासवान के घर के सात लोगों की हत्या की गई थी। वे गुस्से में सबको गाली देते हैं। कहते हैं कि सरकार, प्रशासन और अदालतें सभी तो आरोपियों के ही हैं, तो फिर उन्हें इंसाफ कौन देगा और दिलाएगा।

अब भी दहशत बरकरार

नरसंहार के दौरान एक घर के पांच लोग मारे गए थे। उस परिवार का एक पांच साल का एक बच्चा किसी तरह बच गया था। अब वह 22 साल का युवा विमलेश कुमार है। उसके दो भाई, दो भाभियों और पिता की हत्या कर दी गई थी। विमलेश बताते हैं कि फिर से धमकियां मिलने लगी हैं। घटना को दुहराने की धमकी दी जा रही है। नरेंद्र ठाकुर भी इस बात को दुहराते हैं। मिंता देवी भी कहती हैं कि अब इंसाफ की उम्मीद कैसे करें, जब सभी आरोपी अपने घर लौट आए। मिंता कहती हैं कि अब तो आरोपियों के हौसले और बढ़ गए हैं। गांव में फिर से दहशत बढ़ने लगी है।

मीडिया पर भी गुस्सा

नई पीढ़ी की आंखों में अच्छे भविष्य के सपने
लोगों को मीडिया पर भी काफी गुस्सा है। काफी शिकायतें भी हैं और लोग मीडिया से उबे हुए भी हैं। नेताओं की तरह मीडिया ने उन्हें मायूस भी किया है। यही वजह है कि बातचीत में बाथे के लोग मीडियाकर्मियों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं। कई बार उन्हें यह भी भय होता है कि कहीं मीडियाकर्मी के नाम पर कोई आरोपियों की ओर जासूसी करने तो नहीं आया है। पीड़ित मीडियाकर्मियों पर भी बिके होने का आरोप लगाते हैं। नरेंद्र ठाकुर कहते हैं कि मीडिया उनकी बात को काट देता है और आरोपियों की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है। वैसे उनका आरोप गलत भी नहीं है। सबने देखा है कि 2012 में कुख्यात ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के समय कैसे सभी समचार पत्र और चैनल कई दिनों तक लगातार अपनी छातियां पीट-पीटकर रूदन करते रहे थे। 

नई पीढ़ी में नई चेतना

नई पीढ़ी के बच्चे अपनी दुनिया को संवारने के सपने देख रहे हैं। उनकी आंखों में कुछ कर गुजरने और अपनेआप को साबित करने का हौसला है। बच्चे नौकरी पाने के लिए मिहनत कर रहे हैं। उनसे हत्याकांड के बारे में पूछने का हौसला ही नहीं हुआ।
सुधीर

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

नमो और उनके प्रशंसक

इन दिनों नरेंद्र मोदी के प्रशंसक छाए हुए हैं। आप फेसबुक पर चले जाएं, ट्विटर पर चले जाएं या फिर बाजार में। किसी प्रशंसक का दिल मोदी की तारीफ करते हुए थक नहीं रहा। खास बात यह है कि ये प्रशंसक मोदी मोदी और खुद की भी असलियत बताने में दिन रात जुटे हैं। ख्याल रहे कि यह आलेख मैं फेसबुक और ट्विटर पर मौजूद मोदी भक्तों के विचार के आधार पर लिख रहा हूं।
मोदी अपने प्रशंसकों की नजर में क्या हैं, जरा गौर करें। सबसे अधिक प्रशंसक मानते हैं मोदी के आगे अटल बिहारी वाजपेयी की योग्यता कुछ नहीं थी। जो काम वाजपेयी छह साल में नहीं कर पाए, उन्हें मोदी चुटकी बजाते ही कर देंगे। अब मोदी से अपेक्षित कामों पर नजर डालें।
सबसे अधिक प्रशंसक को लगता है कि मोदी भारत को हिंदू राष्ट्र बना देंगे। अगर नहीं भी बना सके तो कम से कम मुसलमानों को यहां से भगा देंगे। मोदी फिर से एक बार सरकार प्रायोजित दंगा कराएंगे और सेना व पुलिस के सहारे सभी मुसलमानों के संहार करवा देंगे। प्रशंसकों को यह भी लगता है कि मोदी पाकिस्तान पर हमला कर देंगे। मोदी के आगे न तो भारतीय संविधान का कोई महत्व है और न ही अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का। मोदी मानो सर्वशक्तिमान हैं और कथित ईश्वर ने उन्हें दुनिया को संचालित करने का जिम्मा सौंप दिया है।
मोदी भक्तों ने देशभक्ति की नई परिभाषा भी गढ़ दी है। मोदी का समर्थन का मतलब है देशभक्त और मोदी के विरोध का मतलब है देशद्रोही। इस देशभक्ति के दायरे में और भी शर्तें हैं। जैसे- देश में दंगे करने के लिए तैयार रहना, विपक्षी दलों और उम्मीदवारों के लिए अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल करना, अल्पसंख्यों में भय पैदा करने की कोशिश करना, असमानता की नींव पर टिकी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सर्वोच्च बताना आदि।
अगर आप इन शर्तों पर खरा उतरते हैं तो मोदी के प्रशंसकों की नजर में देशभक्त हैं अन्यथा देशद्रोही हैं।
मित्रों! मोदी ने अमेरिकी पीआर कंपनी को प्रतिवर्ष करीब 100 करोड़ रुपए की भारी भरकम फीस देकर अपनी छवि विकास पसंद नेता की बनाई। उन्होंने खुद को ऐसा दिखाने का प्रयास किया कि गुजरात विकास के मामले में पूरे विश्व का रोलमॉडल है। गुजरात को ऐसा दिखाने की कोशिश की कि वहां न तो कोई बेरोजगार है और न ही गरीब। कुपोषण और किसी तरह का अपराध तो वहां है ही नहीं। यह और बात है कि विभिन्न संसदीय समितियां और यूनिसेफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन मोदी के दावों की पोल खोलते रहे और बताया कि गुजरात में हद दर्जे की गरीबी तो है ही, कुपोषण के मामले में भी गुजरात अव्वल है। तब मोदी ने तमाम खामियों के लिए सार्वजनिक रूप से गुजरात में रह रहे दूसरे राज्यों के लोगों को जिम्मेदार ठहरा दिया। शुक्र है कि बाल ठाकरे एंड खानदान की तरह दूसरे राज्य के लोगों के साथ पेश नहीं आए, सिर्फ जिम्मेदार ठहराकर ही रुक गए।
तो फिर बात करें कि मोदी ने जो अपनी छवि पीआर कंपनी से तैयार करवाई, क्या वाकई मोदी वही हैं। कोई विजन वाला नेता, जो देश को विकसित बनाने के लिए जी जान से जुटा हुआ है। जब मोदी अपने प्रशंसकों को यह विश्वास नहीं दिला सके तो भला कोई और कैसे मान ले। मोदी के तमाम प्रशंसकों के विचारों का अध्ययन कीजिए। शायद ही किसी प्रशंसक ने गुजरात के विकास के लिए उनकी तारीफ की हो। किसी ने उनकी उद्योग-व्यापार नीति या विकास के कथित विजन की प्रशंसा की हो। मोदी के प्रशंसक उनकी दूसरी खासियतों के लिए तारीफ करते हैं, जिन्हें ऊपर बताया दिया गया है। हालांकि व्यक्तिगत रूप से मैं मानता हूं कि मोदी ने गुजरात में अल्पसंख्यकों की भले ही रक्षा नहीं की हो या गरीबों के लिए कोई खास काम नहीं किया हो, लेकिन पूंजीपतियों के हक में कई कदम उठाए। इसीलिए बिना शक मोदी पूंजीपतियों के सबसे पसंदीदा नेता हैं। यह भी ख्याल रखना चाहिए कि विकासित राज्यों के सूचकांक में गुजरात दूसरी श्रेणी की कतार में है।
यही मूल चीज है जिसे जानना है कि मोदी के प्रशंसक भी उन्हें विकसित विचार या विजन का नेता नहीं मानते। यानी मोदी अगर लोकप्रिय हैं और चुनाव में जो भी सफलता हासिल करेंगे, उसका आधार उनकी अल्पसंख्यक विरोधी कट्टरवादी नेता की छवि होगी।
अब उनके प्रशंसकों की योग्यता जानिए। पहली योग्यता तो यह है कि विरोधियों के लिए गालियां और अपशब्दों का खूब प्रयोग करना आना चाहिए। दूसरी योग्यता है कि अफवाह फैलाने में माहिर होना चाहिए। यानी कि मोदी की प्रशंसा में और विरोधी पार्टियों के खिलाफ आधारहीन बातें अधिक से अधिक फैलाने का अच्छा अभ्यास होना चाहिए। फेसबुक के पुराने मोदी भक्त नए मोदी भक्तों के इसका लगातकर प्रशिक्षण देते रहते हैं। कोई भी आधारहीन इमोशनल बात लिखकर अंत में लिखेंगे कि अगर आप देशभक्त हैं तो अधिक से अधिक शेयर कीजिए। यानी देशभक्त होने की एक शर्त्त यह ही है कि आप मोदी भक्तों के कितने कमेंट और कंटेंट शेयर करते हैं।
तो अपने भक्तों की नजर में मोदी कैसे हैं, जानने के लिए फेसबुक और ट्विटर पर उनके कमेंट देखते रहें।
सुधीर

बुधवार, 15 जनवरी 2014

देश से किरण बेदी की दगाबाजी

याद कीजिए लोकपाल को लेकर अन्ना के आंदोलन को। 16 अगस्त 2012 को शुरू हुआ आंदोलन। सभी आंदोलनकारियों ने साफ तौर पर कहा था कि वे राजनीति नहीं करेंगे। अन्ना और उनके तमाम सहयोगियों पर कांग्रेस के विरोध का आरोप लगा था। कहा गया था कि वे भाजपा के पक्ष में काम कर रहे हैं। तब सबने बड़े जोर से जवाब दिया था कि कानून बनाना सत्तारूढ़ दल का काम है। सत्ता में कांग्रेस है, इसलिए वे उसके खिलाफ बोल रहे हैं। कई बार यह भी कहा कि अगर कांग्रेस अन्ना के पसंद का लोकपाल बिल पास कर देती है तो वे कांग्रेस का विरोध बिल्कुल नहीं करेंगे। यह भी कहा कि वे किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं कर रहे हैं और न करेंगे। तर्क यह भी दिया कि सभी राजनीतिक दल समान रूप से भ्रष्ट हैं।
आश्वासन के बाद भी लोकपाल बिल पास नहीं हुआ। टीम अन्ना हिसार उपचुनाव में खुलकर कांग्रेस के विरोध में आ गई। उन्होंने किसी उम्मीदवार को समर्थन तो नहीं दिया, लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार का विरोध किया। कांग्रेस के उम्मीदवार की बुरी तरह से पराजय हुई।
उसके बाद भी आंदोलन चलता रहा। फिर वह घड़ी आई जब अरविंद केजरीवाल लोकपाल बिल की मांग को लेकर खुद अनशन पर बैठे। कुछ दिनों के बाद अन्ना भी अनशन में शामिल हुए। सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। उसी अनशन के बाद टीम अन्ना ने राजनीति में आने का फैसला किया। मंच से सार्वजनिक रूप से घोषणा की गई कि अब टीम अन्ना राजनीति में आएगी। जनता से भी सहमति ली गई।
लेकिन कुछ दिन ही बीते थे कि इस पर टीम अन्ना दो भागों में बंट गई। एक ऐसा पक्ष तैयार हुआ जो पहले की तरह राजनीति से दूरी बनाए रखने पर अड़ा रहा। खुद        अन्ना इसी खेमे में थे। इसमें किरण बेदी व कुछ और सदस्य थे।
दूसरा गुट अरविंद केजरीवाल का था। इसमें उनके साथ मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास आदि थे। 2 अक्टूबर 12 को आम आदमी पार्टी का गठन हुआ। अन्ना और उनके साथियों ने टीम केजरीवाल से दूरी बनाए रखी। हां, जब बिजली बिल को लेकर केजरीवाल ने जब अनशन किया तो अन्ना उनसे मिलने आए। लेकिन वे और उनके साथ रह गए लोग राजनीति से दूरी बनाए रखने पर अड़े रहे।
दिसंबर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी दिल्ली में छा गई। दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी और फिर सरकार भी इसी की बन गई।
उधर, अन्ना संसद के शीतकालीन सत्र के साथ लोकपाल की मांग को लेकर अपने गांव रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठ गए। चार राज्यों में पराजय का असर हो या कुछ और, सरकार ने संसद में लोकपाल बिल पेश कर दिया। इस पर भी दोनों गुटों की राय बंटी रही। केजरीवाल ने इसे बाहियात बताया तो टीम अन्ना ने सही करार दिया। बहरहाल संसद से बिल पास हो गया और अन्ना ने अनशन समाप्त कर दिया।
इसी के साथ अन्ना के सहयोगी अपना रूप दिखाने लगे। इसमें खुलकर आगे आईं किरण बेदी। कांग्रेस ने जैसे ही लोकपाल बिल पास किया और किरण बेदी भाजपा के समर्थन में उतर गईं।
अब तक राजनीति से तौबा करती रही किरण बेदी को अचानक नरेंद्र मोदी देश के मसीहा नजर आने लगे। पहले ट्विटर पर समर्थन किया और अगले दिन तमाम मीडियाकर्मियों के सामने। वह नेता किरण बेदी को अचानक सबसे बेहतर नजर आने लगा, जिसे उसके प्रशंसक भी अल्पसंख्यकों के कट्टर दुश्मन के रूप में देखते हैं।
जो टीम अन्ना के राजनीति में उतरने के एकदम खिलाफ थीं, वो एकदम एक पार्टी विशेश के समर्थन में उतर आईं। ऐसा क्यों हुआ, लोग अपने-अपने हिसाब से सोच रहे हैं।
अब फिर से सारी बातों को रिवाइंड कीजिए। आंदोलन के समय हमेशा कहा गया कि टीम अन्ना किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है और न ही किसी के समर्थन में है। सभी दलों को समान रूप से भ्रष्ट कहा गया। लोकपाल बिल पास न होने के लिए जिम्मेदार भी सभी दलों को ठहराया गया था। जब हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध किया जा रहा था तो भी किसी दल या उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया गया। सिर्फ इसलिए कि कहीं यह संदेश नहीं जाए कि टीम अन्ना किसी खास दल के पक्ष में होने के कारण कांग्रेस का विरोध कर रही है।
जब राजनीतिक दल के गठन की बात आई तो इसी किरण बेदी ने सबसे अधिक विरोध किया। कहा जाता है कि बेदी ने ही अन्ना हजारे को इससे पर रहने के लिए मोटिवेट किया। किरण बेदी खुलकर कहती रहीं कि अन्ना और वे किसी तरह की राजनीति के पक्ष में नहीं हैं। और अब अचानक भाजपा का खुलकर समर्थन...। सभी चकित हैं कि क्या अन्ना अंदर से मोदी के पक्ष में थे। क्या अन्ना का कांग्रेस विरोध भाजपा के समर्थन में था? कांग्रेस ने लोकपाल की मांग पूरी की और उसके तुरंत बाद बीजेपी का विरोध!
किरण वेदी के इस कदम ने अन्ना के पूरे आंदोलन को ही शक के घेरे में ला दिया है। अब तक अन्ना और उनके सहयोगियों के राजनीति निरपेक्ष होने के दावों पर ही प्रश्नचिह्न लग गया है।
अरविंद केजरीवाल ने तो मंच से अन्ना के तमाम समर्थकों से अनुमति लेकर राजनीति शुरू की। यहां तक उस वक्त अन्ना की भी सहमति थी। घोषणा के अनुरूप उन्होंने किसी दल को न समर्थन दिया और न मांगा। दिल्ली की जनता ने भी जनादेश देकर साबित किया कि वह केजरीवाल के फैसले के साथ है। साथ ही, तमाम आंदोलनकारियों से किए गए वादे के अनुरूप किसी पार्टी का समर्थन भी नहीं किया। लेकिन किरण बेदी...!
तो कारण क्या हो सकते हैं? एक तो यह कि किरण वेदी की का संबंध भाजपा से शुरू से ही था, जिसे उन्होंने समय आने पर उजागर किया। वह दिल्ली चुनाव से पहले भी दबे स्वरों में भाजपा का समर्थन यह कहकर कर चुकी थीं कि आप कांग्रेस का विकल्प नहीं हो सकती। दूसरा निष्कर्ष यह भी निकलता है कि किरण वेदी के मन में अरविंद केजरीवाल को लेकर पूर्वाग्रह है। और इस हद तक है कि उन्हें दागदार अतीत वाले नरेंद्र मोदी का तो नेतृत्व पसंद है लेकिन बेदाग अरविंद केजरीवाल का नहीं। शायद यही वजह है कि उन्हें केजरीवाल और उनकी सरकार में तो तमाम खामियां नजर आती हैं लेकिन भाजपा के किसी नेता या सरकार में एक भी नहीं। यह तो साबित हो ही गया कि केजरीवाल की राजनीति करने के पक्ष में वह क्यों नहीं थीं।
किरण वेदी जी! यह दगाबाजी है। अन्ना के आंदोलन के साथ। आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम और माहौल के साथ। अन्ना के अनशन के मकसद के साथ। इतिहास आपको इसी रूप में याद करेगा।
सुधीर