राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

नमो और उनके प्रशंसक

इन दिनों नरेंद्र मोदी के प्रशंसक छाए हुए हैं। आप फेसबुक पर चले जाएं, ट्विटर पर चले जाएं या फिर बाजार में। किसी प्रशंसक का दिल मोदी की तारीफ करते हुए थक नहीं रहा। खास बात यह है कि ये प्रशंसक मोदी मोदी और खुद की भी असलियत बताने में दिन रात जुटे हैं। ख्याल रहे कि यह आलेख मैं फेसबुक और ट्विटर पर मौजूद मोदी भक्तों के विचार के आधार पर लिख रहा हूं।
मोदी अपने प्रशंसकों की नजर में क्या हैं, जरा गौर करें। सबसे अधिक प्रशंसक मानते हैं मोदी के आगे अटल बिहारी वाजपेयी की योग्यता कुछ नहीं थी। जो काम वाजपेयी छह साल में नहीं कर पाए, उन्हें मोदी चुटकी बजाते ही कर देंगे। अब मोदी से अपेक्षित कामों पर नजर डालें।
सबसे अधिक प्रशंसक को लगता है कि मोदी भारत को हिंदू राष्ट्र बना देंगे। अगर नहीं भी बना सके तो कम से कम मुसलमानों को यहां से भगा देंगे। मोदी फिर से एक बार सरकार प्रायोजित दंगा कराएंगे और सेना व पुलिस के सहारे सभी मुसलमानों के संहार करवा देंगे। प्रशंसकों को यह भी लगता है कि मोदी पाकिस्तान पर हमला कर देंगे। मोदी के आगे न तो भारतीय संविधान का कोई महत्व है और न ही अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का। मोदी मानो सर्वशक्तिमान हैं और कथित ईश्वर ने उन्हें दुनिया को संचालित करने का जिम्मा सौंप दिया है।
मोदी भक्तों ने देशभक्ति की नई परिभाषा भी गढ़ दी है। मोदी का समर्थन का मतलब है देशभक्त और मोदी के विरोध का मतलब है देशद्रोही। इस देशभक्ति के दायरे में और भी शर्तें हैं। जैसे- देश में दंगे करने के लिए तैयार रहना, विपक्षी दलों और उम्मीदवारों के लिए अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल करना, अल्पसंख्यों में भय पैदा करने की कोशिश करना, असमानता की नींव पर टिकी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सर्वोच्च बताना आदि।
अगर आप इन शर्तों पर खरा उतरते हैं तो मोदी के प्रशंसकों की नजर में देशभक्त हैं अन्यथा देशद्रोही हैं।
मित्रों! मोदी ने अमेरिकी पीआर कंपनी को प्रतिवर्ष करीब 100 करोड़ रुपए की भारी भरकम फीस देकर अपनी छवि विकास पसंद नेता की बनाई। उन्होंने खुद को ऐसा दिखाने का प्रयास किया कि गुजरात विकास के मामले में पूरे विश्व का रोलमॉडल है। गुजरात को ऐसा दिखाने की कोशिश की कि वहां न तो कोई बेरोजगार है और न ही गरीब। कुपोषण और किसी तरह का अपराध तो वहां है ही नहीं। यह और बात है कि विभिन्न संसदीय समितियां और यूनिसेफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन मोदी के दावों की पोल खोलते रहे और बताया कि गुजरात में हद दर्जे की गरीबी तो है ही, कुपोषण के मामले में भी गुजरात अव्वल है। तब मोदी ने तमाम खामियों के लिए सार्वजनिक रूप से गुजरात में रह रहे दूसरे राज्यों के लोगों को जिम्मेदार ठहरा दिया। शुक्र है कि बाल ठाकरे एंड खानदान की तरह दूसरे राज्य के लोगों के साथ पेश नहीं आए, सिर्फ जिम्मेदार ठहराकर ही रुक गए।
तो फिर बात करें कि मोदी ने जो अपनी छवि पीआर कंपनी से तैयार करवाई, क्या वाकई मोदी वही हैं। कोई विजन वाला नेता, जो देश को विकसित बनाने के लिए जी जान से जुटा हुआ है। जब मोदी अपने प्रशंसकों को यह विश्वास नहीं दिला सके तो भला कोई और कैसे मान ले। मोदी के तमाम प्रशंसकों के विचारों का अध्ययन कीजिए। शायद ही किसी प्रशंसक ने गुजरात के विकास के लिए उनकी तारीफ की हो। किसी ने उनकी उद्योग-व्यापार नीति या विकास के कथित विजन की प्रशंसा की हो। मोदी के प्रशंसक उनकी दूसरी खासियतों के लिए तारीफ करते हैं, जिन्हें ऊपर बताया दिया गया है। हालांकि व्यक्तिगत रूप से मैं मानता हूं कि मोदी ने गुजरात में अल्पसंख्यकों की भले ही रक्षा नहीं की हो या गरीबों के लिए कोई खास काम नहीं किया हो, लेकिन पूंजीपतियों के हक में कई कदम उठाए। इसीलिए बिना शक मोदी पूंजीपतियों के सबसे पसंदीदा नेता हैं। यह भी ख्याल रखना चाहिए कि विकासित राज्यों के सूचकांक में गुजरात दूसरी श्रेणी की कतार में है।
यही मूल चीज है जिसे जानना है कि मोदी के प्रशंसक भी उन्हें विकसित विचार या विजन का नेता नहीं मानते। यानी मोदी अगर लोकप्रिय हैं और चुनाव में जो भी सफलता हासिल करेंगे, उसका आधार उनकी अल्पसंख्यक विरोधी कट्टरवादी नेता की छवि होगी।
अब उनके प्रशंसकों की योग्यता जानिए। पहली योग्यता तो यह है कि विरोधियों के लिए गालियां और अपशब्दों का खूब प्रयोग करना आना चाहिए। दूसरी योग्यता है कि अफवाह फैलाने में माहिर होना चाहिए। यानी कि मोदी की प्रशंसा में और विरोधी पार्टियों के खिलाफ आधारहीन बातें अधिक से अधिक फैलाने का अच्छा अभ्यास होना चाहिए। फेसबुक के पुराने मोदी भक्त नए मोदी भक्तों के इसका लगातकर प्रशिक्षण देते रहते हैं। कोई भी आधारहीन इमोशनल बात लिखकर अंत में लिखेंगे कि अगर आप देशभक्त हैं तो अधिक से अधिक शेयर कीजिए। यानी देशभक्त होने की एक शर्त्त यह ही है कि आप मोदी भक्तों के कितने कमेंट और कंटेंट शेयर करते हैं।
तो अपने भक्तों की नजर में मोदी कैसे हैं, जानने के लिए फेसबुक और ट्विटर पर उनके कमेंट देखते रहें।
सुधीर

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सरकार में सिरफिरों की भरमार


जब देश में चारों ओर लोग महंगाई की मार से त्रस्त हैं, आम आदमी की थाली से एक-एक कर व्यंजन घटते जा रहे हैं, वैसे समय में देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम को इस बात पर आश्चर्य होता है कि लोग खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने पर नाराज क्यों होते हैं। उनके आश्चर्य का कारण यह है कि लोग महंगाई को दोष देते हैं, पर बोतल का पानी और आइस्क्रीम क्यों खाते हैं। उनके बयान का भावार्थ यह है कि आइसक्रीम खाने वाले और बोतल का पानी पीने वाले को खाद्य पदार्थों पर कीमत बढ़ने पर कोई दिक्कत प्रकट नहीं करना चाहिए। हां, अगर लोग इस लायक हो जाएं कि कभी आइस्क्रीम भी न खा सकें, सफर आदि में बोतलबंद पानी के बजाय सरकारी सप्लाई वाला बदबूदार पानी या फिर वह भी पीने लायक न बचें, तब वे खाद्यान्नों की कीमत बढ़ने का विरोध करें। यह देश के गृहमंत्री का बयान है, जिसे एक अच्छे अर्थशास्त्री की भी शोहरत भी हासिल है। क्या यह बात एक नार्मल व्यक्ति कह सकता है? अगर चिदंबरम ने गरीबों का मजाक उड़ाने के लिए ऐसा कहा, तब तो उन्हें अहंकारी व संवेदनहीन कहकर दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन अगर उन्होंने गंभीरता से यह बात कही तो उन्हें सिरफिरा के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। विपक्ष का कहना है कि वे अहंकारी व संवेदनहीन हैं, जबकि खुद कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि ऐसा नहीं है। तो फिर चिदंबरम को दूसरी श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
यूपीए सरकार में ऐसा पागलपन कोई पहली बार नहीं देखने कोई मिला। महीने दो महीने बीतते-बीतते कोई न कोई मंत्री अपने दिमागी असंतुलन का सबूत दे ही देता है। कभी-कभी मंत्रियों के चुकने पर कोई अन्य सहयोगी यह कोटा पूरा कर देता है।
चिदंबरम के बयान के एक दिन पहले कानून मंत्री सलमान खुर्शीद खुद ही कांग्रेस को दिशाहीन बता चुके थे। क्या कोई नाॅर्मल दिमाग का बुढ़ा व कथित अनुभवी नेता अपनी पार्टी के बारे में ऐसा बयान दे सकता है।
सरकार में एक ऐसे ही काफी होनहार सज्जन हैं- कपिल सिब्बल। किसी मनचले नेता ने एक पुराने कार्टून को लेकर आपत्ति प्रकट कर दी, जिसमें अंबेदकर व नेहरू थे। उस कार्टून को नेहरू ने भी देखा था और अंबेदकर ने भी। दोनों को ही उसपर आपत्ति नहीं थी। आपत्ति उन्हें हुई, जो लोग खुद चलते-फिरते कार्टून हैं। कपिल सिब्बल ने अपने बड़े से दिखने वाले दिमाग से बड़ा पागलपन निकाला। उन्होंने आदेश दिया कि किताबों में नेताओं से संबंधित जितने भी कार्टून हैं, सभी को हटा दिया जाये। शुक्र है, किसी ने अभी किताबों के काले अक्षरों को नस्लवाद से नहीं जोड़ा है, वरना पागलमंडली क्या करती, पता नहीं। सिब्बल इससे पहले भी देश में सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्था सीएजी के रिपोर्ट को बकवास करार दे चुके हैं। वह भी अपने प्रिय ईमानदार साथियों ए राजा व कनिमोझी को बचाने के लिए। ऐसे कारनामे कोई नाॅर्मल आदमी कर सकता है क्या?
अगर चिदंबरम और सिब्बल दोनों मिल जाएं, तो क्या हो सकता है? बहुत दिमाग दौड़ाने की जरूरत नहीं है। कई उदाहरण सामने हैं। दोनों मिलकर शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे लोगों पर, जिनमें काफी संख्या में महिलाएं हों, आधी रात को लाठीचार्ज करवा सकते हैं। किसी को भी दिल्ली में शांतिपूर्वक अनशन करने के लिए जगह देने से इनकार कर सकते हैं। देश में शांति भंग करने का मनगढ़ंत आरोप लगाकर किसी को भी उसके घर से उठवाकर जेल भेजवा सकते हैं। किसी को नौकरी छोड़ने के एक दशक बाद अचानक कर्ज बकाया का नोटिस भिजवा सकते हैं। किसी योगगुरू को महान संत बताते-बताते 72 घंटे के अंदर उसे षड्यंत्रकारी, अवैध ढंग से व्यापार करने वाला, विपक्षी पार्टी का एजेंट आदि की उपमा दे सकते हैं। ऐसे और ढेरों उदाहरण आपको मिल जाएंगे।
इस सरकार में एक और कद्दावर और वरिष्ठ मंत्री हैं- शरद पवार। वे कृषि मंत्री हैं। चिदंबरम ने खाद्यान्नों की कीमत बढ़ने पर आपत्ति जाहिर करने पर आश्चर्य किया था, तो पवार महंगाई का कारण बताते हैं। उनसे जब पूछा गया था कि खाद्यान्नों की महंगाई इतनी क्यों बढ़ रही है, तो बड़े से पेट वाले पवान का जवाब था कि लोग अधिक खाने लगे हैं। इसलिए महंगाई बढ़ रही है। उनकी नजर में महंगाई घटाने के लिए लोगों को कम अनाज खाना होगा। क्या यह आपको किसी नाॅर्मल आदमी का जवाब लगता है?
पागलों का एक खास लक्षण होता है कि वह दूसरे सामान्य आदमी को पागल समझता है। यह लक्षण प्रकट हुआ पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय। अन्ना के आंदोलन को जब पूरा देश समर्थन कर रहा था, तब सुबोधकांत सहाय ने अन्ना को सार्वजनिक रूप से पागल कहा था।
पहले एक और कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह अपने आपको सबसे बड़ा विद्वान साबित करने में लगे रहते थे। वे इतने आगे बढ़ गये कि पूरे देश को पता चल गया कि यह आदमी पागल है। इसका पता कांग्रेस को भी चला। कांग्रेस ने तुरंत बयान जारी कर दिया कि दिग्विजय के बयान को एक नाॅर्मल कांग्रेसी का बयान न माना जाये।
इसी सरकार में एक विदेश राज्य मंत्री हुआ करते थे- शशि थरूर। उन्होंने हवाई जहाज के इकोनोमी क्लास में यात्रा करने वालों की तुलना भेड़-बकरियों से की थी। इस सच से सभी वाकिफ होंगे कि इस देश में हवाई जहाज के किसी भी क्लास में यात्रा करने की हैसियत दो प्रतिशत से अधिक लोगों की नहीं है। थरूर के हिसाब से, यहां की 98 फीसदी लोग भेड़-बकरियों से भी गये-गुजरे हैं।
पूर्व मंत्रियों में दो और महारथी हैं- सुरेश कलमाड़ी व ए राजा। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान जिस तरह से निर्माण कार्य करवाये गये और खेलों व खिलाड़ियों के लिए सामग्रियों की जिस तरह से खरीद हुई या किराये पर लाये गये, वह कलमाड़ी की मानसिक स्थिति बताने के लिए काफी है। इसी तरह ए राजा को जब दूरसंचार विभाग मिला, तो उन्होंने इसे सरस्वती पूजा का प्रसाद बांटने का काम समझा और पहले आओ-पहले पाओ की तर्ज पर बांट दिया। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन दोनों को पागलखाने के बजाय जेल भेज दिया गया। उम्मीद की जा रही है कि थरूर समेत इन दोनों को भी मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी, ताकि जनता क्रूर मनोरंजन का लुत्फ उठा सके।
अब थोड़ी चर्चा सरकार के कथित मुखिया मनमोहन सिंह की। कथित इसलिए कि असली मुखिया कौन है, सभी जानते हैं। इन पर किसी सुख-दुख का असर नहीं होता। आवाज- भावहीन, चेहरे की भंगिमा-सपाट, बाॅडी लांगवेज-अपरिभाषित। मनोविज्ञान के अनुसार, ऐसे लक्षण तब प्रकट होते हैं, जब व्यक्ति पागलपन की हद से भी पार निकल जाये।
जब-कभी मंत्री अपना पागलपन दिखाना बंद कर देते हैं, तब उनके आजु-बाजू के लोग इसे दिखाते हैं। इनमें बड़ा नाम है मोंटेक सिंह अहलूवालिया का। आज के जमाने में 26 रुपये रोज की आमदनी वाले को अमीर कोई मूर्ख भी नहीं कह सकता। और फिर 26 रुपये पर अमीर का तमगा देने वाला यही आदमी अपने टाॅयलेट की मरम्मत पर 35 लाख रुपये खर्च कर देता है। उस टाॅयलेट के लिए, जिसमें करीब दर्जन भर आदमियों को ही जाने की इजाजत है। ऐसा व्यक्ति को विक्षिप्त नहीं, तो और क्या है?
पूरे कांग्रेसियों के दिमाग का हाल यह है कि उन्हें आज तक नेहरू खानदान से बाहर कोई योग्य व्यक्ति दिखता ही नहीं।
कहा जाता है कि सत्ता आदमी को घमंडी बना देती है, लेकिन यूपीए दो की सरकार इस बात का गवाह है कि सत्ता आदमी को पागल भी बना सकती है। ख्याल रहे, सामान्य क्रूर व्यक्ति से पागल क्रूर व्यक्ति की क्रूरता अधिक क्रूर होती है।
सुधीर