मंगलवार, 27 सितंबर 2011

घोटालेबाजों का रक्षक पीएम

देश जब मनमोहन सिंह के इस बयान की उम्मीद कर रहा था कि वे टूजी मामले में किसी भी मंत्री की भूमिका की निष्पक्ष जांच के लिए तैयार हैं, उन्होंने कहा कि वे अपने मंत्रियों का बचाव करेंगे। अभी तक इस बेषर्मी से किसी भी प्रधानमंत्री ने आरोपित या विवादित मंत्रियों का बचाव नहीं किया था। अंदर से बचाने की चाहे लाख कोषिष होती रहे, कोई भी प्रधानमंत्री यही दिखाता है कि वह निष्पक्ष जांच के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री के इस बयान ने चिदंबरम को और भी संदिग्ध बना दिया है। पूरा देष समझने लगा है कि अगर चिदंबरम निर्दोष होते तो उन्हें बचाने के बजाय जांच द्वारा निर्दोष साबित किया जाता। अब तो हालात बनने के बजाय बिगड़ेंगे ही।
यह करीब-करीब साफ हो चुका है कि टूजी घोटाले में पी चिदंबरम की अहम भूमिका रही है। ए राजा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जिस नीति के तहत घोटाला हुआ उसमें तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम की पूरी सहमति एवं सहभागिता थी। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने संसद के रिकॉर्ड के हवाले से कहा कि टूजी स्पेक्ट््रम की नीति बनाने में दूरसंचार और वित्त मंत्रालय की बराबर भूमिका थी। बताते चलें कि यह घोटाला नीतियों का लाभ उठाकर ही किया गया है। इसके बाद रही सही कसर प्रणब मुखर्जी ने पूरी कर दी। उनकी ओर से प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र भेज कर कहा गया कि चिदंबरम इस घोटाले को रोक सकते थे। पूरा घोटाला उनकी जानकारी में हुआ है। यह पत्र जैसे ही मीडिया के हाथ लगी, चिदंबरम की पूरी कलई खुल गयी। गौरतलब है कि चिदंबरम ने यह कारनामा वित्त मंत्री के रूप में किया था और अभी प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री हैं। एक तरह से चिदंबरम के ही मंत्रालय ने उनकी भूमिका साबित कर दी है।
इस मामले में मनमोहन सिंह की भूमिका कभी भी ईमानदार नहीं रही। जब सीएजी ने यह साफ कर दिया कि टूजी स्पेक्ट््रम निलामी में सरकारी खजाने को एक लाख 75 हजार करोड़ रुपये का चूना लगाया गया है, मनमोहन चुप्पी साधे रहे। मामला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, तो बात बढ़नी शुरू हुई। फिर भी ए राजा दूरसंचार मंत्री बने रहे। बाद में जब सुप्रीम कोर्ट ने सोनिया-मनमोहन सरकार को कई बार लताड़ लगायी तो राजा को मंत्री पद से हटाया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देष पर मनमोहन सिंह को विवष होकर मामले की जांच सीबीआई से करानी पड़ी। सीबीआई ने भी अपने पहली ही जांच में स्पष्ट कर दिया कि घोटाला हुआ है। लेकिन सरकार का पूरा जोर इस घोटाले को दबाने में लगा रहा।
ए राजा की जगह कपिल सिब्बल को दूरसंचार मंत्रालय सौंपा गया। मामला न्यायालय में था। सीबीआई जांच कर रही थी। सिब्बल ने मंत्रालय संभालते ही सबसे पहला बयान दिया कि टूजी मामले में एक भी पैसे का घोटाला नहीं हुआ है। उन्होंने सीएजी और सीबीआई को ही झूठा करार देकर दोनों की विष्यसनीयता पर सवाल खड़े कर दिये। कपिल सिब्बल ने अपनी ओर से ए राजा को पूरी तरह से निर्दोष साबित कर दिया। निष्पक्षता के लिहाज से तो सिब्बल की भी जांच होनी चाहिए कि आखिर किस वजह से उन्होंने देष को गुमराह करने की कोषिष की।
बहरहाल, यह मामला इतना आसान नहीं था कि दब जाता। तब सोनिया-मनमोहन सरकार ने विपक्ष पर दबाव बनाने के लिए एनडीए के कार्यकाल तक की जांच करने का आदेष जारी कर दिया। वैसे भी अपने दूसरे कार्यकाल में कांग्रेस यह बार-बार साबित करती रही है कि उसपर अंगुली उठाने वाले की खैर नहीं। अन्ना व उनके सहयोगी, बाबा रामदेव आदि अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं।
मामला अपनी राह पर चल रहा था। यूपीए सरकार भी खुष थी कि राजा की बलि देकर वह टूजी मामले को पार कर चुकी है। असली पेंच तब आया जब राजा ने वित्त मंत्रालय को भी इस खेल में शामिल होने का भांडा फोड़ दिया। इसे राजा का अपने बचाव के लिए हथियार माना गया। परंतु, प्रणब द्वारा पीएमओ को भेजी गयी चिट्ठी ने चिदंबरम को पूरे देष के सामने नंगा कर दिया। यह सीधे तौर पर वित्त मंत्रालय द्वारा वित्त मंत्री पर आरोप लगाने का मामला था।
हो सकता है कि यूपीए सरकार में मंत्रियों के बीच वर्चस्व की जंग हो। लेकिन इतना बड़ा आरोप एक वरीय मंत्री का दूसरे वरीय मंत्री पर बिना ठोस सबूत के नहीं लगाये जा सकते। मनमोहन सिंह की मुष्किलें बढ़ती गयीं। उन्हें चिदंबरम पर निर्णय लेना था। परंतु, अभी तक इसकी अनुमति 10 जनपथ से मिली नहीं। उनके पास अब इसके सिवा कोई रास्ता न बचा कि वे खुलकर टूजी के आरोपितों का बचाव करें। वे वही कर रहे हैं।
सीबीआई ने चिदंबरम मामले को लेकर बयान दिया है कि इस नीति निर्माण के मामले में चिदंबरम की कोई भूमिका नहीं थी। उससे इसी बयान की उम्मीद भी थी क्योंकि सीबीआई प्रधानंत्री कार्यालय के ही अधीन काम करती है।
फिर भी अगर सोनिया-मनमोहन सरकार को अगर लगता है कि इस ढिठाई से मामला थम जाएगा तो वह गलत है। टू जी स्पेक्ट््रम घोटाला कांग्रेस व गांधी परिवार के लिए बोफोर्स का पुनर्जन्म बनकर आया है। बोफोर्स मामले को लेकर राजीव गांधी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी और उसका भूत अभी तक गांधी परिवार को तंग करता रहा है। उसी तरह टू जी स्पेक्ट््रम विवाद की आग में भी यूपीए सरकार को अपने लपेटे में लेने को तैयार है। सिर्फ दिक्कत यह है कि वीपी सिंह की तरह विपक्ष में ऐसा कोई नेता नहीं, जो मामले को राष्ट्र्व्यापी बना सके।
कुछ भी न हुआ तो इतना तो होगा ही कि मनमोहन सिंह को एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जिसने घोटालेबाजों को बचाने के लिए पूरी शक्ति लगा दी। ऐसे घोटालेबाजों को बचाने में, जिनके खिलाफ पर्याप्त सबूत और गवाहियां थीं।

सुधीर

कोई टिप्पणी नहीं: