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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

डायन प्रथा को बढ़ावा दे रहे पुरोहित

एक ओर सरकार, प्रशासन और बुद्धिजीवी तबका डायन प्रथा को खत्म करने के प्रयास में जुटा है, दूसरी ओर पुरोहित बिरादरी पूरे जोर-शोर से डायन प्रथा को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। पुरोहितों और उनकी ढकोसलेबाजी का प्रमुख समर्थक मीडिया भी इसमें अप्रत्यक्ष रूप से खूब समर्थन कर रहा है।

पहले हम जानते हैं कि डायन प्रथा का मूल आधार क्या है? डायनों के बारे में कहा जाता है कि वह मंत्र पढ़कर (देहातों में बान मारना भी कहा जाता है) किसी की जान ले ले सकती है या फिर बीमार कर दे सकती है। मंत्र के सहारे वह ऐसे कारनाम कर सकती है, जो और किसी भी तरह संभव ही नहीं है।
विज्ञान के विकास ने और मानवाधिकारों के प्रति बढ़ती जागरुकता ने इन ढकोसलों के खिलाफ काफी काम किया है। लोगों को लगातार लंबे अरसे तक समझाने के बाद काफी हद तक यह समझाने में सफलता मिली है कि डायन का असर केवल मन का वहम है। ऐसा कुछ नहीं होता। बीमारियों और मौतों के पीछे दूसरे कारण होते हैं।
परंतु, दूसरी ओर पुरोहित लगातार मंत्रवाद को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। वे दिन-रात इस थ्योरी में लगे रहते हैं कि मंत्रों में शक्ति होती है। मंत्रों का असर होता है। हालांकि मंत्रों के असर का षड्यंत्रों का काफी हद तक पर्दाफाश हो चुका है, लेकिन पुरोहित वर्ग इसे फिर से लोगों के मन में बिठाने में लगा है। इसमें पूरा साथ दे रहा है मीडिया।
लगभग सभी समाचार पत्रों और चैनलों में मंत्रों की महिमा बार-बार बताई जा रही है। फलाने मंत्र से यह लाभ होता है, फलाने मंत्र से शक्ति बढ़ती है, फलाने मंत्र से पुत्रों की रक्षा होती है। कई बार तो यह चुटकुला की हद तक हास्यास्पद हो जाता है। जैसे हाल ही में नागपंचमी के दिन एक समाचार पत्र में छपा कि फलाने मंत्र के जाप से सर्पदंश का असर कम हो जाता है। पाखंड फैलाने वाला यह आलेख आधे पेज पर छपा था। यह लिखने वाला पुरोहित और छापने वाला संपादक दोनों ही जानते हैं कि यह कोरा पाखंड फैलाने से अधिक कुछ नहीं है।

इसी तरह चैनलों और अखबारों में देवी-देवताओं को खुश करने वाले मंत्र लगातार बताये जा रहे हैं। कई दीर्घायु होने के मंत्र भी हैं। हालांकि हाल के वर्षों में देवताओं को खुश करने में लगे भक्त ही थोक में मर रहे हैं या मारे जा रहे हैं। केदारनाथ, वैष्णो देवी, बोलबम यात्रा आदि इसके ढेर सारे उदाहरण हैं।
यह सर्वविदित है कि पाखंड फैलाने के लिए पुरोहितों ने ढेर सारे संगठन बना रखे हैं। इन्हीं में से एक है गायत्री परिवार। यह संगठन हरिद्वार में मंत्रों की शक्ति पर कथित रूप से अनुसंधान कर रहा है। आप यहां जाकर देखें तो पता चलेगा कि पाश्चात्य सुविधाओं से लैस यह कथित प्रयोगशाला लोगों को मूर्ख बनाने के अलावा और कुछ नहीं करता। इसके समर्थक और भक्त गायत्री मंत्र के ढेर सारे प्रभाव गिना देते हैं। मेधावी होने से लेकर दीर्घायु होने तक के। इनके पाखंड का खुलासा इसी से हो जाता है कि यह संस्थान आज तक एक साधारण वैज्ञानिक भी पैदा नहीं कर सका। हालांकि यह एक यूनिवर्सिटी भी चलाता है- देव संस्कृति विश्वविद्यालय। गायत्री मंत्रों की शक्ति का आलम यह है कि चंद वर्ष पहले गायत्री मंत्रों के उच्चारण के बीच भगदड़ मची और दर्जन भर भक्तों की मौत हो गई।

पुरोहित वर्ग लगातार ढोंग ढकोसले फैलाने के उपाय तलाशते रहता है। कभी गणेश को दूध पिलाकर, कभी पेड़ में देवी-देवताओं के चेहरे दिखाकर। और फिर ढेर सारे पर्व-त्यौहार तो हैं ही।
लेकिन मंत्रों का प्रभाव बताना इन सबमें सबसे अधिक खतरनाक है। यह सीधे तौर पर डायन प्रथा और झाड़-फूंक को बढ़ावा देना है। अपनी दुकानदारी चलाने के लिए पुरोहित वर्ग यह लगातार कर रहा है। शर्मनाक है कि इसमें मीडिया घराने भी सहयोग कर रहे हैं। तिलक लगाने वाले ढोंगियों का बाजार गुलजार हो जाएगा, यह उतना खतरनाक नहीं है। लेकिन मंत्रों का असर अगर लोगों को दिमाग में बैठने लगा तो फिर डायन के नाम पर गरीब गरीब और लाचार औरतों की शामत आ जाएगी। उन पर अमानवीय जुल्म तेजी से बढ़ने लगेंगे।
इसी तरह हवन आदि कर्मकांडों को भी बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। चंद दिन पहले लालू जी हृदय का ऑपरेशन कराने भर्ती हुए तो समर्थकों ने पटना में हवन किया। हवन में इतनी ही शक्ति है तो फिर लालूजी को समझाना चाहिए था कि वे अस्पताल में भर्ती होने की मूर्खता क्यों कर रहे हैं? देवता ऐसे ही वरदान देकर ठीक कर देंगे।
ऐसा ही नजारा क्रिकेट विश्वकप के दौरान भी दिखता है। प्रशंसक टीम को जीतने के लिए हवन करते हैं। जब टीम हारती है तो क्रिकेटरों पर गुस्सा करते हैं। अरे मूर्खों, जब तुम्हारे देवताओं की जीत दिलाने की औकात नहीं थी कि तो बेचारे क्रिकेटर तो साधारण मनुष्य हैं। अखबार वाले भी देवी-देवताओं की बजाय खिलाड़ियों को कोसने लगते हैं। इससे यह तो साफ जाहिर हो जाता है कि सबको बता है कि हवन और प्रार्थना सिवाय ढोंग-ढकोसला के और कुछ नहीं है। लेकिन पुरोहित प्रपंच जारी रखने के लिए यह आवश्यक है। चाहे देश जितना बदहाल हो जाए। मंत्र की शक्ति साबित करने के पाखंड को बढ़ावा देते रहेंगे।

पुरोहितों को इससे क्या? उन्हें तो सिर्फ अपनी दुकान की फिक्र है। वे अपनी दुकान चलाने के लिए साईं को लेकर तो धर्मसभा कर सकते हैं, लेकिन एक बार भी डायन प्रथा का विरोध नहीं कर सकते। लेकिन वे भी बेचारे क्या करें, डायन प्रथा को झूठा कहेंगे तो उनके मंत्रों के पाखंड का पर्दाफाश हो जाएगा। उनकी दुकान बंद होने लगेगी। और मीडिया भी आजकल दुकानदारी ही हो गया है। उसे चाहिए मसाला और विज्ञापन चाहे निर्मल जैसे चुटकुलेबाज बाबा को ही क्यों न दिन-रात चलाना पड़े। चाहे इसके लिए लोगों को जागरुक करने की बजाय अंधविश्वास ही क्यों न फैलाना पड़े।
तो फिर हल क्या है? पुरोहितों को तो कोई समझा नहीं सकता कि अब पाखंड फैलाना बंद करो। जो लोग डायन प्रथा को गलत मानते हैं, उन्हें मुखर होना पड़ेगा। डायन प्रथा की जड़ पर प्रहार करना होगा। वह यह है कि लोगों को बताया जाए कि मंत्रों में कोई शक्ति नहीं होती। यह पुरोहितों की चाल है अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए।

सुधीर

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

अलग-अलग पावर के देवी-देवता

सावन आते ही शंकरजी के भक्त शिवमंदिरों में उमड़ पड़े हैं। मुहल्ले से लेकर देवघर और फिर अमरनाथ तक। मुहल्ले वाले शंकरजी का भाव जो सालों भर रहता है, उससे थोड़ा ही बढ़ पाता है। आस्थावान भक्त देवघर या फिर अमरनाथ वाले शंकरजी के पास जाना पसंद करते हैं।

काफी अधिक छानबीन करने पर पता चला है कि दरअसल मुहल्ले वाले शंकरजी कम पावर के होते हैं। जाहिर सी बात है कि मंदिर छोटा है तो शंकरजी का पावर भी कम ही रहेगा। यूं समझ लीजिए कि मुहल्ले के शंकरजी 12 वोल्टेज के हैं, अगल-बगल के मंदिर वाले 24 वोल्टेज के, देवघर वाले 36 वोल्टेज के और अमरनाथ वाले को आप एक सोलर प्लांट के बराबर पावर वाले शंकरजी हैं। घर के कैलेंडर वाले को तो कोई पूछता भी नहीं, क्योंकि सबको पता होता है कि उनमें पेंसिल बैट्री के बराबर भी पावर नहीं है।
हो सकता है कि कुछ भक्त इसपर विश्वास नहीं करें। लेकिन यह तो देखने की चीज है। आखिर सभी शंकरजी बराबर वोल्टेज के ही होते तो कोई अधिक कष्ट उठाकर, अधिक पैसे खर्च करके मुहल्ले वाले को छोड़कर देवघर और अमरनाथ क्यों जाता?
अलग-अलग शंकरजी का भक्तों से उम्मीदें भी अलग-अलग तरह की होती हैं। जैसे मुहल्ले वाले शंकरजी को आप कुएं या चापाकल का पानी भी चढ़ा सकते हैं। वहीं देवघर वाले शंकरजी केवल गंगाजी का पानी पसंद करते हैं। अमरनाथ के शंकरजी किसी भी तरह के पानी को चढ़ाया जाना पसंद नहीं करते।
मुहल्ले के शंकरजी के पास आप पैदल, साइकिल से या किसी तरह जा सकते हैं। देवघर वाले शंकरजी चाहते हैं कि भक्त सुल्तानगंज तक चाहे जैसे आएं लेकिन सुल्तानगंज से देवघर तक पैदल ही आएं। पैदल आनेवाले भक्तों का भी शंकरजी ने दो वर्ग बना दिया है। जिन्हें बड़ा वरदान या तुरंत वरदान चाहिए उन्हें डाकबम के नाम से 24 घंटे में पहुंचना होता है, बाकी के लिए कोई पूरा सावन पड़ा है। हालांकि यह अभी तक पता नहीं चल सका है कि उस भारी भीड़ में देवघर वाले शंकरजी डाकबम और साधारण भक्तों का रजिस्टर मेंटेन कैसे करते हैं। वहीं अमरनाथ वाले बर्फानी बाबा के पास भक्त किसी भी तरह से पहुंच सकते हैं। हालांकि वहां पहुंचने के लिए भक्त बर्फानी बाबा से अधिक चीन सरकार के मोहताज हैं।

शोध में यह भी पाया गया है कि बाकी दिनों की अपेक्षा सोमवार को शंकरजी वरदान देने और मनोकामना पूरा करने के मूड में अधिक होते हैं। सावन में शंकरजी फुल चार्ज रहते हैं। सावन में शंकरजी यह भी देखते रहते हैं कि कहीं कोई भक्त मांस-मछली तो नहीं खा रहा है। बाकी दिन खाते-पीते रहने से शंकरजी कोई लेना-देना नहीं है।
एक खास बात यह भी पता चला है कि शंकरजी को अपने पूरे शरीर पर पानी डलवाना बिल्कुल भी पसंद नहीं है। वे चाहते हैं कि भक्त और भक्तिन केवल उनके लिंग पर ही पानी डालें।
शोध में एक बात सामने आई कि पिछले साल केदारनाथ वाले शंकरजी और इंद्र महाराज में झगड़ा हो गया। इंद्र भारी पड़े। शंकरजी ने अपना घर तो बचा लिया, लेकिन भक्तों को बचा पाने में विफल रहे। उनके आस-पास के कई कम वोल्टेज वाले देवी-देवता भी इंद्र के कोप में बह गए। यूं कह लीजिए कि गेहूं के चक्कर में घुन पिस गया, गेहूं बच गया।
पावर की बात केवल शंकर भगवान तक ही सीमित नहीं है। यह बाकी देवताओं पर भी लागू होता है। जैसे घर में भी हनुमानजी की मूर्ति होती है या फिर कैलेंडर होता है। लेकिन बात वही वोल्टेज की है। मंदिर वाले हनुमानजी अधिक वोल्टेड के होते हैं। इनका वरदान देने का मूड मंगलवार के दिन अधिक होता है। शोधार्थियों के अनुसार रामनवमी के दिन हनुमानजी फुल चार्ज रहते हैं।
फुल रिचार्ज के मामले में बाकी देवी-देवताओं ने साल में अपना एक-एक दिन बना रखा है। जैसे कृष्ण जी की पूजा आमतौर पर लोग सालों भर करते रहते हैं। भजन कीर्तन भी करते रहते हैं। साथ में भक्त अपनी फरमाइश, दुख-तकलीफ आदि भी बताते रहते हैं। लेकिन जन्माष्टमी के दिन कृष्णजी फुल रिचार्ज रहते हैं। उस दिन भक्त अपनी फरमाइश जरूर बताते हैं। यहां तक कि रोज दिखने वाले सूर्य देव भी अपना वरदान वाला अटैची केवल छठ में ही खोलते हैं।
दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश आदि भी साल में एक बार फुल चार्ज होकर वरदान देते हैं। शोधार्थियों का एक दल सरकार से मांग करनेवाला है कि परीक्षाएं सरस्वती पूजा के दिन ली जाएं। कई भक्तों को जब स्थानीय देवी-देवताओं के वोल्टेड पर भरोसा नहीं रहता तो वे वैष्णो देवी तक जाते हैं।
नए देवताओं में भी यह प्रवृति बढ़ी है। जैसे साईं बाबा का कैलेंडर से वरदान का केवल डेमो मिलता है। पूरा वरदान सिरडी जाने पर मिलता है।

ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ हिंदुओं में होता है। मुस्लिम रमजान में रोजा रखें या सालों भर पांचों वक्त का नमाज अदा करें, लकिन उन्हें अल्लाह अपनी इनायत का डेमो वर्जन ही देता है। फुल वर्जन पाने के लिए उन्हें हज करनी पड़ती है। हिंदू देवताओं की तरह अल्लाह शुक्रवार यानी जुम्मा के दिन फुल चार्ज होता है। मस्जिद में नमाज पढ़ने पर डायरेक्ट खुदा से कनेक्शन जुड़ता है, कहीं दूसरी जगह से पढ़ते हैं तो यह एक्सटेंशन की तरह होता है। यानी खुदा ध्यान दे भी सकता है और नहीं भी। ऐसा भी कह सकते हैं कि मस्जिद में नमाज पढ़ने पर खुदा अधिक वोल्टेज से इनायत बरसाता है और दूसरी जगह से नमाज पढ़ने पर कम वोल्टेज का। शुक्रवार के दिन खुदा फुल चार्ज रहता है।
ईसाइयों के साथ भी यही हाल है। रविवार को यीशु मसीह फुल चार्ज रहते हैं। आप हाथ से क्रॉस बनाकर कहीं भी यीशु को याद कर सकते हैं, लेकिन चर्च में याद करने पर यीशु अधिक वोल्टेज का वरदान देते हैं।
शोध की बाकी बातें बाद में। तो आप भी पूजा कीजिए, लेकिन देख लीजिए की आप जिसकी पूजा कर रहे हैं, उस देवी या देवता या अल्लाह या यीशु का वोल्टेज कितना है और वे फुल चार्ज हैं कि नहीं। वरदान मिलना तय है। फुल वर्जन न सही, डेमो वर्जन ही। और हां, देवी-देवताओं के मामले में किसी भी बात को मजाक में न लें।

सुधीर

शुक्रवार, 20 जून 2014

बलात्कार को बढ़ावा देते हैं धर्म

कुछ दिन पहले मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा था कि धर्म बलात्कार को बढ़ावा देते हैं। इसपर कई लोगों ने विरोध जताया और बहुतों ने बेबुनियाद बताया। मैं इस आलेख के माध्यम से तथ्यों के साथ सारी बातें फिर से लिख रहा हूं।
पोस्ट यह था-
(हिंदू धर्म और इस्लाम में तो बलात्कार को कहीं गलत बताया ही नहीं गया है। इंद्र ने अहिल्या से बलात्कार किया, लेकिन वह देवताओं का राजा बना रहा। सजा मिली भी तो पीड़िता अहिल्या को ही। विष्णु ने तुलसी का यौन शोषण किया था। जुए के शौक के लिए बीवी को दावं पर लगाने वाले को धर्मराज कहा गया। मर्यादा पुरुषोत्तम राजा ने अपनी पत्नी को जंगल में भिजवा दिया यह जानते हुए भी कि वहां कोई भी हादसा हो सकता है। सूर्य, धर्मराज, पवन और इंद्र ने कुंती के साथ जो किया, उसे रेप के अलावा और क्या कहा जा सकता है। द्रोपदी को भी उसकी रजामंदी के बिना पांच भाइयों से शादी करवा दी गई। इसे आजीवन गैंगरेप की सजा कह सकते हैं।
इस्लाम में तो रेप पीड़िता को ही कसूरवार ठहरा दिया जाता है। यहां तक कि शरियत के नाम पर भी गैंगरेप करने के मामले भी प्रकाश में आ चुके हैं। दुबई में शरियत के हवाले से दोषी के बराबर ही पीड़िता को भी सजा देने का प्रावधान है। गाजी बनने की चाह में जितने भी मुसलमान दूसरे मुल्कों पर हमला करते थे, वे वहां की औरतों को गुलाम बना लेते थे और अपने सैनिकों में बांट देते थे। उन महिलाओं के साथ बर्बरता से गैंगरेप किया जाता था। शर्मनाक यह है कि मौलाना इस्लाम के हवाले से इसकी इजाजत देते थे।
ईसा की मां मरियम जब कुंवारी थी तभी ईसा का जन्म हुआ था। यीशु को आज तक पिता का नाम नहीं मिला। संभव है मरियम के साथ किसी ने रेप किया हो।)
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रामायण
अब चलिए इसे तथ्यों के आइने में देखते हैं। रामायण हिंदुओं का सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक है। जिसने भी रामायण पढ़ी होगी, वह इस बात को जरूर जानता होगा कि इंद्र ने अहिल्या से बलात्कार किया था। इसमें एक और देवता ने भी साथ दिया था- चंद्रमा ने। चंद्रमा को देवता बताने वाले हिंदू ऋषियों के ज्ञान पर बात में चर्चा कीजिएगा। पहले इस रेपकांड पर चर्चा। रामायण के अनुसार, अहिल्या गौतम ऋषि की पत्नी थी। हिंदू धर्म में सबसे महान देवता को माना जाता है। आज भी कोई बहुत अच्छा आदमी होता है तो कह दिया जाता है कि एकदम देवता है। तो महान देवताओं का राजा था इंद्र। अब राजा की महानता देखिए। वह लंबे समय से अहिल्या की खूबसूरसती पर फिदा था और किसी तरह उसके साथ सेक्स करना चाहता था। लेकिन उसे किसी तरह मौका नहीं मिल रहा था। आखिरकार जब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने चंद्रमा की मदद ली। रात में ही सुबह का एहसास कराकर गौतम को स्नान के लिए नदी भिजवा दिया और खुद अंधेरे में इंद्र ने अहिल्या के साथ सेक्स किया। जब इसका पता चला तो गौतम ने इंद्र और चंद्रमा को जो दंड दिया सो दिया, सबसे बड़ा दंड अहिल्या को दिया। उसे पत्थर बनने का शाप दिया। अब कोई बताए कि अहिल्या का इसमें क्या दोष था? पूरे रामायण में किसी ने भी इस नाइंसाफी के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाई। यानी धोखे से अगर कोई रेप किया तो भी पीड़िता को ही सजा।

शरीयत
अब हिंदू धर्म की दूसरी कथाओं से पहले इस्लाम में इसी तरह के प्रावधान के बारे में जान लीजिए। दुबई का नाम सबने सुना होगा। वहां शरीयत का कानून लागू है। शरीयत शुरा शब्द से बना है। कुरान के अध्यायों को शुरा कहते हैं। यानी कुरान के अनुसार लागू कानून शरीयत है। वहां नार्वे की एक महिला मार्टे डेब्रो डालेल्व से रेप हुआ। जब उसने पुलिस से शिकायत की तो उसपर गैर मर्द के साथ सेक्स करने का आरोप लगाकर 14 महीने की सजा सुना दी गई। आश्चर्यजनक है कि इस मामले में दोषी को तीन महीने की सजा सुनाई गई। अब शरीयत का कानून जानिए। संयुक्त अरब अमीरात का कानून कहता है कि रेप तभी माना जा सकता है जब रेपिस्ट खुद आपना गुनाह कबूल ले या फिर रेप करते समय कम से कम चार व्यस्क मुसलमान पुरूषों ने देखा हो। पूरी घटना जानने के लिए इन लिंकों पर क्लिक करें। दैनिक भास्कर पर पढ़िए - (http://www.bhaskarhindi.com/News/19150/.html) या नवभारत टाइम्स पर पढ़ें- (http://navbharattimes.indiatimes.com/world/asian-countries/norwegian-woman-who-reported-being-raped-in-dubai-is-jailed-for-16-months/articleshow/21186472.cms) या (http://www.meribitiya.com/bitiya-khabar/40-2010-11-04-08-29-13/1323-saudi-arab-rape-jail-women-norway.html) या आज तक पर पढ़िए- http://aajtak.intoday.in/story/norwegian-woman-who-reported-being-raped-in-dubai-is-jailed-for-16-months-1-736414.html आप तलाशेंगे तो यह खबर और भी कई साइटों पर मिल जाएगी। खबर में यह भी बताया आस्ट्रेलिया की एक युवती एलिसिया गली ने भी कुछ दिन पहले गैंगरेप की शिकायत की थी। इस पर उसे आठ महीने की सजा सुना दी गई।
अब बताइये कि कौन रेपिस्ट अपना गुनाह कबूल करेगा या फिर रेप के कितने मामलों में चार लोग मौजूद रहते हैं। अगर चार लोग मौजूद ही होगा तो कोई रेप कैसे करेगा? तब भले ही कर सकता है, जब चारों उस रेप में शामिल हों या गैंगरेप करें। यह भी संभव है कि चार लोग रेप होते देख लें तो चुप रहने के लिए रेपिस्ट उन्हें भी रेप करने का ऑफर दे दे या वही लोग ऑफर रख दें। इसके अलावा इस कानून का यह भी अर्थ है कि अगर कहीं कोई लड़की/औरत एकांत में  दिखे तो उसका रेप कर सकते हैं। कोई देखेगा नहीं तो सजा नहीं होगी। यानी एकांत में मिल जाने पर किसी भी महिला के साथ रेप और कोई देख ले तो उसे भी अपना साथी बनाकर गैंगरेप करने की पूरी छूट! यह है शरीयत का कानून यानी कुरान का आदेश। शरीयत के इसी कानून के चलते अफगानिस्तान में कई रेप पीड़िताओं को ही दोषी मानकर पत्थर से मार-मारकर जान मार देने के मामले प्रकाश में आते रहे हैं।

विष्णु पुराण
अब विष्णु की कहानी। हिंदु देवताओं के तारणहार भगवान विष्णु। एक राक्षस था शंखचूड़। वह देवताओं से पराजित ही नहीं हो रहा था। विष्णु ने शस्त्रों के साथ मनोवैज्ञानिक लड़ाई लड़ी। वह जानता था कि कोई चाहे जितना बलवान हो, उसकी पत्नी के साथ रेप हो जाए तो वह तत्काल उतना शक्तिशाली नहीं रह जाता। विष्णु ने शंखचूड़ की पत्नी वृंदा के साथ दुष्कर्म कर दिया और उसे अगले जन्म में तुलसी के रूप में पत्नी होने का वरदान दिया।
किसी भी सभ्य दुनिया या संस्कृति में इसे कभी सही नहीं माना जा सकता कि दुश्मन की बीवी के साथ दुष्कर्म किया जाए। क्या इसे जायज माना जाएगा कि भारत पाकिस्तान में जंग हो और नवाज शरीफ की पत्नी के साथ नरेंद्र मोदी दुष्कर्म करें या फिर नवाज शरीफ प्रणब मुखर्जी की पत्नी के साथ रेप करें? क्या इसे कोई सही कहा जा सकता है कि जॉर्ज बुश सद्दाम हुसैन की पत्नी का रेप करें या बराक ओबामा ओसामा बिन लादेन की पत्नी के साथ बलात्कार करें? दुश्मनी के बनाने औरतों से रेप कैसे जायज ठहराया जा सकता है? लेकिन हमारे धर्म न केवल इसे सही ठहराते हैं, बल्कि आज तक विष्णु पूज्य बने हुए हैं।

महाभारत
अब द्रोपदी की कहानी। अमर कथा महाभारत। सबसे पहले द्रोपदी की शादी। स्वंयवर में तो द्रोपदी ने अर्जुन से शादी की थी। लेकिन ससुराल पहुंचते ही उसे अर्जुन के शेष चारों भाइयों से भी शादी करनी पड़ी। हिंदुओं में एक आम मान्यता है कि छोटे भाई की पत्नी को बहन या बेटी समझो और बड़े भाई की पत्नी यानी भाभी को मां के समान समझो। लेकिन यहां तो पांडवों ने भाभी और भावज दोनों को ही बीवी की ही नजर से देखा। कथा है कि पांडवों की मां (नकुल और सहदेव की सौतेली मां) कुंती ने द्रोपदी को बिना देखे ही कह दिया कि पांचों आपस में बांट लो। इसे ही शादी का आधार बताया जाता है। यह कैसा आधार है? मां ने कह दिया तो खुद पांडवों की नैतिकता कहां मर गई थी? क्या वे कह नहीं सकते थे कि भावज या भाभी से शादी नहीं कर सकते हैं। कहा जाता है कि कुंती की बात सत्य साबित करने के लिए पांडवों ने ऐसा किया। पूरे महाभारत में युद्धिष्ठिर के अलावा किसी के सत्यवादी होने की चर्चा ही नहीं है। कुंती का तो बिल्कुल ही नहीं। एक अहम सवाल यह भी है कि द्रोपदी की इच्छा क्यों नहीं पूछी गई? क्या कोई सभ्य लड़की कभी चाहेगी कि ससुराल पहुंचते ही उसके पति के सारे भाई उससे शादी करें और हनीमून मनाएं? एक बात और। अगर पांडव कौरवों की तरह 100 भाई होते तो? या अगर कुंती ने यह कह दिया होता कि ठीक है, आधे तुम लोग आपस में बांट लो और आधा पड़ोसियों में बांट दो। या यह कह दिया होता कि मकानमालिक का काफी किराया हो गया है, जो भी लाए हो, मकानमालिक को किराए में दे दो।
सच तो यह है कि द्रोपदी आजीवन सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई। बलात्कार भी उसने किया, जिसे हिंदू समाज सत्य और न्याय का पुजारी मानता है-पांडवों ने। ससुराल में नई नवेली लड़की निरिह होती है। पांडवों ने उसका फायदा उठाया। तेलगु के एक साहित्यकार ने महाभारत के भाष्य में यह लिखा है कि द्रोपदी इतनी सुंदर थी कि उसको लेकर पांडवों में फूट पड़ सकती थी। इसलिए कुंती ने यह रास्ता निकाला।( साहित्यकार का नाम याद नहीं आ रहा है, दिनकर के संस्कृति के चार अध्याय में इसका जिक्र है)। महाभारत की नायिका द्रोपदी की हालत का अंदाजा लगाइये। ससुराल पहुंचते ही पांच पति। सभी साथ रहते हैं। किसी नौकरी या ड्यूटी पर भी जाने की फिक्र नहीं।
बाद में यह नियम बना कि सारे पति बारी-बारी से एक-एक सप्ताह द्रोपदी के साथ रहेंगे। लेकिन इस नियम की चर्चा भी महाभारत में तब आई है, जब पांडव 12 साल के वनवास पर थे। उससे पहले तक द्रोपदी के साथ वे कैसे रहे और द्रोपदी कैसे रही, इस पर व्यास मौन हैं। पाठकों को अपने ढंग से समझने के लिए छोड़ दिया गया है। क्या ऐसा नहीं लगता कि वनवास तक गैंगरेप से काफी प्रताड़ित हो चुकी द्रोपदी ने एक सप्ताह वाला नियम बनाया?

महाभारत
धर्मनिष्ठ पांडव वनवास कैसे गए, यह भी सभी जानते हैं। धर्मराज युद्धिष्ठिर ने जुए में पत्नी को ही दावं पर लगा दिया। जो जुए में किसी की बीवी को जीतेगा वह उसके साथ क्या करेगा, यह दावं पर बीवी को लगाने वाले जुआरियों को भी पता होता है। अब बताइये कि जुए में जीती द्रोपदी को सरेआम नंगा करने पर उतारू दुर्योधन अधिक गलत है या फिर दावं पर लगाने वाला युद्धिष्ठिर? यह धर्मराज की करतूत थी। यानी महाभारत का सबसे धर्मनिष्ठ पात्र अपनी बीवी को जुए में दावं पर लगाता है। अब धर्म का अनुसरण कैसे किया जाए?
पांडवों के जन्म की कहानी सभी जानते होंगे। कुंती को वरदान मिला कि वह जिस देवता को बुलाना चाहेगी, वह आ जाएंगे। पहले सूर्य देवता आए। कमसिन कुंती डरकर जाने को कहने लगी। सूर्यदेव ने कहा कि वह आते हैं तो यूं ही नहीं जाते। कुछ न कुछ देकर ही जाते हैं। सूर्यदेव ने कुछ के नाम पर कुंती को बेटा दिया-कर्ण। कुंती ने कर्ण को जन्म दिया था। अब कोई औरत किसी बच्चे को कैसे जन्म दे सकती है, यह सभी लोग जानते हैं। सूर्य देवता कुछ और भी दे सकते थे, लेकिन उन्होंने कुंती को पुत्र दिया। जाहिर सी बात है कि डरती हुई कुंती के साथ सूर्यदेव ने रेप किया। दिलचस्प है कि उसी रेपिस्ट सूर्यदेव से आज भी हिंदू स्त्रियां छठ करते हुए पुत्र का वरदान मांगती हैं। कहीं सचमुच वरदान देने आ गए तो...। कुंती के अन्य पुत्रों की भी कमोबेश यही कहानी है। यह भी हो सकता है कि कुंती ने बाद में अन्य देवताओं से स्वेच्छा से सेक्स किया हो।
मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने सीता को लक्ष्मण के हाथों जंगल में भेज दिया। जंगल में सीता की सुरक्षा का कोई बंदोबस्त नहीं था। अगर वहां सीता के साथ कोई हादसा नहीं हुआ तो यह महज एक संयोग है। राम ने तो ऐसे हालात बना दिए थे कि सीता के साथ रेप या गैंगरेप कुछ भी हो सकता था।

रामायण
रामायण की एक और बात। सभी जानते हैं कि साहित्य में कई बातें इशारों में लिखी जाती हैं। जिक्र है कि राम के कहने पर लक्ष्मण ने सूर्पनखा का नाक-कान काट लिया। नाक-कान कटना मतलब इज्जत लेना होता है। बहुत संभव है कि वाल्मीकि ने मुहावरे का इस्तेमाल किया हो।

इस्लाम
अब फिर से इस्लाम की चर्चा। इतिहासकार भी सहमत हैं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने जब भारत पर आक्रमण किया, तब बड़ी संख्या में हिंदू महिलाओं के साथ गैंगरेप किया था। औरों की बात छोड़िए। तैमूर लंग ने अपनी आत्मकथा माल्फुजत ए तैमूरी या तुजुक ए तैमूरी लिखी थी। हिंदी में उसका अनुवाद दिल्ली के आंसू के नाम से विश्व सुलभ साहित्य ने प्रकाशित किया है। उसमें तैमूर ने लाखों हिंदू महिलाओं के साथ उसके सिपाहियों द्वारा रेप और गैंगरेप की बात कबूली है। दिलचस्प है कि इसमें मौलवी तैमूर और उसके सिपाहियों को बढ़ावा देते थे। मौलवियों ने उसे गाजी की उपाधि देने का लालच दिया था। तैमूर लंग की आत्मकथा में कई बार जिक्र है कि जीते गए इलाके के तमाम हिंदुओं का कत्ल करने के बाद औरतों को सैनिकों में बांट दिया जाता था।

इस्लाम
अफ्रीकी मुस्लिम देशों में मुसलमान लड़कियों का भी खतना किए जाने का अनिवार्य नियम है। इसके लिए वहां के मौलवियों और मौलानाओं ने फतवे भी जारी कर रखे हैं। यह प्रथा इतनी बढ़ती गई कि उन देशों से ब्रिटेन में पहुंची महिलाएं भी अब अपनी लड़कियों को खतना करवा रही हैं। इसे रोकने के लिए ब्रिटेन में कानून बनाना पड़ा। लड़कियों के खतना में पेशाब करने वाले छिद्र के अलावा योनी बाहर का पूरा मांस काट दिया जाता है। इसके बाद पेशाब करने भर छिद्र छोड़कर पूरी योनी को सिल दिया जाता है। इससे कितना दर्द होता होगा, अनुमान लगाया जा सकता है। उलेमाओं का कहना है कि इससे औरतों में सेक्स की इच्छा खत्म हो जाती है। सच है कि औरतें आजीवन एक ऐसे दर्द से जुझती हैं जिसे किसी से कह भी नहीं सकतीं। यह भी सच है कि सेक्स की इच्छा खत्म हो जाती है और सेक्स करने पर असहनीय दर्द होता है। लेकिन शादी के बाद उन्हें मन रहे या न रहे, सेक्स तो करना ही पड़ता है। यानी बिना मर्जी का सेक्स। असहनीय दर्द भरी यातना। यानी आजीवन बलात्कार। इन लिंकों पर क्लिक करें और पढ़ें। बीबीसी पर- http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130523_female_genital_mutilation_castration_adg.shtml एबीपी न्यूज पर पढ़ें - http://abpnews.abplive.in/world/2014/01/19/article248641.ece/%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%A4#.U6QQ25RdXpk तहलका पर पढ़ें - http://www.tahalkanews.com/?q=node/124 या इसे पढ़ें - http://translate.google.co.in/translate?hl=hi-IN&langpair=en%7Chi&u=http://www.forwarduk.org.uk/key-issues/fgm

कुरान
इस्लाम में एक प्रथा है हलाला। हलाला को आप वाइफ स्वैपी भी कह सकते हैं यानी बीवी की अदलाबदली। मसला यह है कि अगर किसी व्यक्ति ने अपनी बीवी को तलाक, तलाक, तलाक कह दिया तो तलाक हो गया। चाहे उसने नींद में कही हो या गुस्से में कही हो, मजाक में कही हो या नशे में कही हो, या किसी गफलत में या चाहे पूरे होशोहवास में। अब अगर उसे अपनी पत्नी के साथ रहना हो तो फिर से निकाह करना होगा। लेकिन कुरान इसकी इजाजत नहीं देता। नियम यह है कि तलाकशुदा स्त्री को पहले किसी दूसरे मर्द के साथ निकाह कर कम से कम एक रात की बीवी बनना होगा और उससे तलाक लेकर फिर पहले मर्द के साथ शादी करनी होगी। साथ में यह भी जानिए कि इस्लाम में तलाक मर्द ही दे सकता है औरत नहीं। अगर दोनों के एक-दो बच्चे हों और गुस्से में मर्द ने तलाक शब्द तीन बार दुहरा दिए तो इस्लाम के अनुसार अब दोनों साथ नहीं रह सकते। इसके लिए जरूरी है कि औरत किसी और की बीवी बने। इसमें औरत की रजामंदी की कोई जरूरत नहीं है। उसे अपने बच्चे और शौहर के पास आने के लिए किसी दूसरे मर्द के साथ सेक्स करना ही होगा। यह बलात्कार को बढ़ावा नहीं तो और क्या है? यह तो तब भी किया जा सकता है जब दो मर्दों को अपनी बीवियों का अदलाबदली करने का मन करे। ऐसे में दोनों अपनी-अपनी बीवी को तलाक दे दे और बीवियों की इच्छा हो या न हो, वे हलाला के नाम पर एक-दूसरे की बीवी के साथ सेक्स करें। इसीलिए इसे मैंने वाइफ स्वैपी भी कहा।
अब बताइये कि धर्म बलात्कार को बढ़ावा देते हैं या नहीं। आलेख थोड़ा लंबा हो गया, समय मिला तो अगली दफा कभी अन्य धर्मों पर चर्चा।
सुधीर

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

सरस्वती माता का वरदान

सरस्वती पूजा बीत गई. लेकिन इस मायने में यादगार रहेगी कि इस वर्ष विद्या और बुद्धि की देवी सरस्वती ने अपने भक्तों को खूब आशीर्वाद दिया. भक्तों ने भी सरस्वती की कृपा का जमकर इस्तेमाल किया. यूं तो इस कृपा का इस्तेमाल प्रति वर्ष पहले से ही होने लगता है. चंदा वसूली से सरस्वती की दी बुद्धि के लक्षण दिखने लगते हैं. मनामाने ढंग से चंदा का रसीद काटना और गुंडे के स्टाइल में वसूली करना. हजार रुपए के पूजा के लिए भी 25-50 हजार रुपए वसूले जाते हैं. यह वसूली वहां अधिक होती है,जहां दूसरे जगह के दुकानदार या व्यवसायी होते हैं. उन गांवों में भी इसे खूब देखा जा सकता है, जहां से होकर गाड़ियां गुजरती हैं. यहां वरिष्ठ पत्रकार श्री पुष्यमित्र के फेसबुक का एक कथन मौजूं होगा कि सरस्वती पूजा के लिए चंदा करने वालों पर मां सरस्वती की कृपा हमेशा सबसे कम होती है. हालांकि मेरा मानना है कि कृपा कम नहीं होती, बल्कि इसी तरह की कृपा ही होती है. आखिर कोई जब पढ़ाई-लिखाई में तेज होता है, उसपर मां सरस्वती की कृपा कही जाती है. फिर विकृत बुद्धि वालों की जिम्मेदारी से देवी सरस्वती कैसे बच सकती हैं. आखिर वही तो बुद्धि की देवी हैं. वैसे चंदे वाली कृपा तो हमेशा ही मां सरस्वती अपने भक्तों पर रखती है. इस साल मां ने जी खोलकर कृपा दी और भक्तों ने जमकर इस्तेमाल भी किया.
मधेपुरा में प्रतिमा विसर्जन के दौरान गोलियां चलने लगीं, मां सरस्वती के सामने ही. गोली एक चूड़ियां बेचनेवाली महिला को लगी और उसकी मौत हो गई. कुछ गिरफ्तार होकर जेल गए, कई फरार चल रहे हैं. भक्तों की पूजा सफल हुई.
भागलपुर के कहलगांव में मूर्ति विसर्जन के समय शराब पीकर छात्रों ने अपने एक सहपाठी को जिंदा जलाने का प्रयास किया. फिलहाल वह भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है.
पटना सिटी में भी इसी तरह माता ने विसर्जन तक भक्तों की पुकार सुनकर बुद्धि दे दी. विसर्जन के दौरान दो गुट आपस में भिड़ गए. एक की जान चली गई.
पटना में प्रतिमा विसर्जन के समय पटना विश्वविद्यालय और एनआईटी के छात्रों ने भी माता की कृपा का जमकर इस्तेमाल किया. शराब के नशे में धुत छात्रों ने जमकर मारपीट की. वे निकले ही थे हाथों में लाठी-डंडे लेकर. एनआईटी मोड़ पर कृपा का उपयोग करने लगे. दोनों ही गुट सरस्वती भक्तों का ही था. पुलिस पहुंची तो पुलिस से भी भिड़ गए. हद तो यह कि छात्रों को माता ने बमबारी करने की भी बुद्धि दे दी. आखिर बम हर कोई थोड़े ही बना सकता है. माता की कृपा से कम से कम बम बनाना तो सिख ही गए. मूर्ति विसर्जन के समय माता को उसके निर्माण और इस्तेमाल का नमूना भी दिखाया. माता भक्तों से संतुष्ट होकर विदा हुईं.
एनआईटी के पांच भक्तों को मां सरस्वती ने जेल जाने का सफल वरदान दिया. पटना विवि के भी कई छात्रों को यह वरदान मिल चुका है. पुलिस वरदान को सफल बनाने में जुटी है.
झारखंड के कोडरमा में एक घर के लोग माता सरस्वती की आराधना में लीन थे. मूर्ति विसर्जन के जुलूस में शामिल माता की भक्ति में घर की सुध भी भूल गए थे. घर में अचानक आग लग गई और दो बच्चे जलकर मर गए.
पूर्णिया में भक्तों को विसर्जन से पहले ही वरदान मिल गया. माता से भक्तों ने सदबुद्धि की प्रार्थना की. माता ने ऐसी बुद्धि दी कि दो गुटों में पूजा के दौरान झड़प हो गई. एक भक्त को बाकी भक्तों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. एक अन्य की आंख में गहरी चोट आई है.
ऐसा नहीं है कि इतनी ही घटनाएं घटीं. यह तो चंद उदाहरण हैं जो मीडिया में आ सके. अगर सरस्वती माता की कृपा के आंकड़े इकट्ठे किये जाएं, तो गिनने वाला शायद गिनती भूल जाए.
चलते-चलते एक निजी जीवन से जुडी़ घटना बता दूं. तब मैं श्री बाणभट्ट मध्य विद्यालय बंधु विगहा में आठवीं कक्षा में पढ़ता था. पूजा के अगले दिन दोपहर में मेरे एक शिक्षक ने मुझे आरती की तैयारी करने को कहा. पूजा कक्ष में जाते ही देखा की पूरी मूर्ति काली हो चुकी है. आग लगने से आस-पास रखे काफी सामान जल चुके हैं. मैंने तुरंत शिक्षकों को सूचना दी. हुआ यह था कि मूर्ति को अधिक सजाने के लिए कागज की माला और साज का खूब इस्तेमाल किया जाता था. किसी सरस्वती के कृपाप्राप्त भक्त ने मूर्ति में कहीं अगरबती जलाकर खोंस दिया था. उससे आग लग गई थी. मुझे उस दिन भी पता नहीं चला कि पूरी दुनिया पर कृपा करनेवाली मांता खुद में लगी आग भी नहीं बुझा सकी.
मित्रों! सभी जानते हैं कि इधर-उधर के कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो सरस्वती पूजा मुख्य रूप से भारत में ही होती है. न जाने कितनी पीढ़ियों से आराधना करते चले आ रहे हैं. लेकिन वरदान किसे मिलता है. तमाम अविष्कार उन देशों के वैज्ञानिक कर रहे हैं, जिन्होंने कभी सरस्वती का नाम भी न सुना होगा. हम अच्छी शिक्षा के लिए उन्हीं देशों पर आश्रित हैं. बड़े लेखक उन देशों में पैदा हो रहे हैं. तमाम तरह की दवाइयां और टीके उन्हीं देशों के विद्वान बना रहे हैं. तमाम नोबेल पुरस्कार उन देशों के वैज्ञानिकों और विद्वानों को मिलते हैं. हम जिन चीजों का रात-दिन इस्तेमाल करते हैं, उनका अविष्कार करने की बुद्धि हमें कभी नहीं मिली. तमाम तकनीकों के लिए हम विदेशों पर आश्रित हैं.
लेकिन तमाम बातें जानने के बावजूद असर तो होगा नहीं. तो अपनी अक्ल में ताला लगाकर प्रेम से बोलिये विद्या-बुद्धि दात्री माता सरस्वती की जय.

सुधीर