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| समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता को पीटते कांग्रेसी |
...तो लोकतंत्र में कांग्रेसियों के लिए हिंसा का स्थान है। फूलपुर में राहुल गांधी के कार्यक्रम में कांग्रेसी नेताओं ने इसे खूब साबित करने का प्रयास किया। राहुल के चले जाने के बाद बडे़-बड़े कांग्रेसी नेताओं ने समाचार चैनलों पर जो कहा, उसका भी यही सार था कि लोकतंत्र में कांग्रेसियों के लिए हिंसा का स्थान है।
फूलपुर में जो कुछ हुआ, उसने कांग्रेस को फिर से नंगा कर दिया। पाशविक वृत्ति से भरी कांग्रेस के चेहरे से सदाचार का मुखौटा उतर गया। कांग्रेस के अंदर भरी हुई पाशविक वृत्ति एक बार फिर बड़े ही विकृत रूप में प्रकट हुई। कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को काले झंडे दिखाने के विरोध में अपने विरोधियों को जमकर पीटा। इनमें एक की हालत काफी गंभीर कर दी। कांग्रेसी नेता प्रायः अपना हिंसक चेहरा सदाचार के मुखौटे में छुपाये रहते हैं।
कांग्रेस को जानने वालों के लिए यह आश्चर्यजनक नहीं है। अपने विरोधियों को कुचलने की संस्कृति नेहरू के जमाने से ही रही है। दो आश्चर्य वाली बातें जरूर हैं। पहली कि निकट में चुनाव होने हैं। कांग्रेस ऐसे समय में अपने असली रूप अर्थात पाशविक वृत्ति को छुपा लेती है। इस बार उसने उत्तेजना में नाजुक मौके पर अपना असली चेहरा दिखा दिया। इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है। दूसरी बात कि हमेशा की तरह विरोधियों को कुचलने में सरकारी मशीनरी के बजाय कांग्रेसी खुद कूद पड़े। हालांकि दूसरी बात अधिक आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि वहां कांग्रेस के युवराज की नजर में बनने की बात थी। हालांकि जतिन प्रसाद ने जो किया, इससे उनके पिता की आत्मा रो पड़ी होगी। उनके पिता जीतेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के वंशवादी अभियान के खिलाफ आवाज उठायी थी। इसके कारण कांग्रेसियों ने ही उनका काफी अपमान भी किया था। आज उन्हीं का बेटा युवराज को खुश करने के लिए मंत्री पद की गरिमा भूल गया और सड़क छाप गुंडा का आचरण करने लगा।
कांग्रेसियों का नेहरू के बाद से ही काफी विश्वास बढ़ गया है। खास कर नेहरू खानदान की नजरों में वफादार बनने के लिए हिंसा का सहारा लेना सबसे जानी-पहचानी तरकीब है। याद कीजिए 1984 में कांग्रेसियों द्वारा सिक्खों का कत्लेआम। सिक्ख खुद इंदिरा गांधी की हत्या का विरोध कर रहे थे। परंतु, कांग्रेसियों ने अपने आका को खुश करने के लिए सिक्खों का कत्लेआम करना शुरू कर दिया। यह कोई दंगा नहीं था। यह एक खास राजनीतिक दल के आका के समर्थन से उसके कार्यकर्ताओं द्वारा एक समुदाय विशेष का कत्लेआम था। अगर दंगा होता तो उसमें दो धर्म शामिल होते और सिक्ख भी कांग्रेसियों की हत्या करते। परंतु, ऐसा नहीं था।
कांग्रेसियों ने अपने आका को खुश करने के लिए इसी तरह प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की हत्या सरेआम पीट-पीटकर कर दी गयी थी। उनका कसूर यह था कि वे शासन की काली करतूतों को अपने नाटकों के माध्यम से जनता के सामने ला रहे थे।
एक और खास बात यह है कि नेहरू खानदान के समर्थकों ने सभी हिंसक वारदात सरेआम किये। इसका दो मतलब है। पहला तो यह कि सारी दुनिया देखे कि उसके आका के खिलाफ आवाज उठाने का अंजाम क्या होगा। दूसरा यह कि उन्हें कानून का कोई भय नहीं रहता। सरेआम हिंसा से एक और फायदा यह भी होता है कि आका की नजरों में उनका कद बढ़ जाता है।
अन्ना के आंदोलन के दौरान भी देश ने देखा था कि कपिल सिब्बल के एक कार्यक्रम के दौरान सत्याग्रही जब काला झंडा दिखा रहे थे, तो उन्हें कपिल सिब्बल के सामने ही पिटा गया गया था। हिसार में कांग्रेस प्रत्याशी ने कई बार टीम अन्ना को भुगतने की धमकी दी थी। अरविंद केजरीवाल पर चप्पल फेंकनेवाला कांग्रेस सेवादल का सदस्य था। आका के सामने अपना कद बढ़ाने के लिए संजय निरूपम ने तब अपने भाषणों के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं को टीम अन्ना पर हमला करने के लिए उकसाया।
गौरतलब है कि कई बार कांग्रेस सरकारी मशीनरी का सहारा लेकर हिंसा करती रही है। इससे वह सीधे तौर पर जोखिम लेने से बच जाती है। जैसे रामदेव के आंदोलन का उदाहरण देख लीजिए। आधी रात को जिस बर्बरता से महिलाओं व बच्चों पर लाठियां चलवायी गयीं, वह ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाती है। शर्मनाक यह भी काफी है कि कांग्रेस खुद को गांधीवादी और गांधी का वारिस बताती है।
तो क्या कांग्रेस के लिए लोकतंत्र में हिंसा का स्थान है? फूलपुर कांड के बाद कांग्रेसी नेताओं के बयान से तो यही लग रहा है। सरकार में बैठे सोनिया के वफादार लोग हमेशा राग अलापते हैं कि लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। यह संवाद उनके लिए दुहराया जाता है, जो जीने के न्यूनतम साधन भी छिन लिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उन्हें उग्रवादी और देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया जाता है। दूसरी ओर कांग्रेसी नेताओं की हिंसा उन्हें वाजिब लगती है। बहुत ही दुखद यह भी है कि यह हिंसा उस व्यक्ति की नजरों में बनने के लिए की गयी, जिसकी पूरी योग्यता यह है कि उसने इंदिरा खानदान में जन्म लिया। संयोग से ऐसी ही कुछ योग्यता के बल पर जतिन प्रसाद भी राजनीति में आये हैं।
सुधीर

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